उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand la-KHitab aankhen chand be-laqab chehre

चंद ला-ख़िताब आँखें चंद बे-लक़ब चेहरे

چند لا خطاب آنکھیں چند بے لقب چہرے

शायर: Parwez Rahmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चंद ला-ख़िताब आँखें चंद बे-लक़ब चेहरे
हसरतों के आईने बे-हसब-नसब चेहरे

पारे साबित-ओ-सालिम आइनों में हैं जब कि
होते जाते हैं आख़िर मस्ख़ किस सबब चेहरे

पानियों ने बिल-आख़िर रेशा रेशा कर डाला
अक्स-रेज़ियाँ कब तक करते जाँ-ब-लब चेहरे

डूब जब गईं आँखें साथ साथ सूरज के
निकले सैर करने को घाटियों से तब चेहरे

आँख पर न रखते थे कल किसी को लेकिन अब
मौसमों के आगे हैं कैसे बा-अदब चेहरे

कौन ख़ुश-निगाही का दे सुबूत 'रहमानी'
आइना-गज़ीदा हैं आज सब के सब चेहरे