उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand ki tarh damak sakti hai

चाँद की तरह दमक सकती है

چاند کی طرح دمک سکتی ہے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँद की तरह दमक सकती है
तारीकी भी चमक सकती है

तारों की बारात भी आख़िर
चलते चलते थक सकती है

काहकशाँ की गाड़ी इक दिन
रस्ते ही में अटक सकती है

और ज़मीं भी इतना पुराना
अपना बोझ पटक सकती है

एक जगह पर जमी हुई भी
कोई चीज़ खिसक सकती है

तंग आ कर इन सय्यारों का
रौशनी हाथ झटक सकती है

काएनात फैली है जैसे
उसी तरह से पिचक सकती है

और 'ज़फ़र' इक रोज़ अचानक
सारी बात खिचक सकती है