उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chaak ho parda-e-wahshat mujhe manzur nahin

चाक हो पर्दा-ए-वहशत मुझे मंज़ूर नहीं

چاک‌ ہو پردۂ وحشت مجھے منظور نہیں

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाक हो पर्दा-ए-वहशत मुझे मंज़ूर नहीं
वर्ना ये हाथ गरेबान से कुछ दूर नहीं

सज्दे करने से मिटा ख़त्त-ए-जबीं ऐ ज़ाहिद
हम कहे देते हैं क़िस्मत में तिरी हूर नहीं

मोहतसिब माने-ए'-इ'ल्लत है गुमान-ए-मय से
सूँघने को भी मयस्सर मुझे अंगूर नहीं

लब तक आई थी शिकायत कि मोहब्बत ने कहा
देख पछताएगा ख़ामोश ये दस्तूर नहीं

रात दिन नामा-ओ-पैग़ाम कहाँ तक होंगे
साफ़ कह दीजिए मिलना हमें मंज़ूर नहीं

तुम ने दी कोहकन-ओ-क़ैस से मुझ को निस्बत
कोई दीवाना नहीं मैं कोई मज़दूर नहीं

क्या करे 'दाग़' कोई उस की मोहब्बत का इलाज
वो कलेजा ही नहीं जिस में ये नासूर नहीं