उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bijli giri hai kal kisi ujDe makan par

बिजली गिरी है कल किसी उजड़े मकान पर

بجلی گری ہے کل کسی اجڑے مکان پر

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बिजली गिरी है कल किसी उजड़े मकान पर
रोने लगूँ कि हँस पड़ूँ इस दास्तान पर

वो क़हर था कि रात का पत्थर पिघल पड़ा
क्या आतिशीं गुलाब खिला आसमान पर

इक नक़्श सा निखरता रहेगा निगाह में
इक हर्फ़ सा लरज़ता रहेगा ज़बान पर

अपने लिए ही आँख का पर्दा हूँ रात दिन
मैं वर्ना आश्कार हूँ सारे जहान पर

शेर आ के चीर फाड़ गया मुझ को ख़्वाब में
दम-भर को मेरी आँख लगी थी मचान पर

प्यासी है रूह जिस्म शराबोर है तो क्या
बे-कार मेंह बरसता रहा साएबान पर

पीली हवा में ख़ून का ज़र्रा उड़ा ही था
पागल हुआ ये शहर ज़रा से निशान पर

ख़ाली पड़ी हैं बेद की बीमार कुर्सियाँ
ख़ूँ-ख़्वाब धूप-धुँद बरसती है लान पर

किस ताज़ा मा'रके पे गया आज फिर 'ज़फ़र'
तलवार ताक़ में है न घोड़ा है थान पर