उर्दू शायरी · ग़ज़ल

binai se bahar kabhi andar mujhe dekhe

बीनाई से बाहर कभी अंदर मुझे देखे

بینائی سے باہر کبھی اندر مجھے دیکھے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बीनाई से बाहर कभी अंदर मुझे देखे
मुमकिन ही नहीं है वो बराबर मुझे देखे

हो जाए कभी रात मिरे दम से भी रौशन
वो शम्अ-ए-तमाशा जो घड़ी-भर मुझे देखे

मैं ख़ुद में तो मौजूद ही मुश्किल से रहूँगा
हर देखने वाला मिरे बाहर मुझे देखे

ढूँडे कोई मुझ को तो इसी ख़ाक-ए-हवस में
या सिलसिला-ए-सैल-ए-हवा पर मुझे देखे

माहौल ही कुछ हो चमन-ए-ख़्वाब का ऐसा
बुलबुल मुझे समझे तो गुल-ए-तर मुझे देखे

अब देखना ही शर्त ये ठहरी है कि यूँ हो
मैं मंज़र-ए-नायाब को मंज़र मुझे देखे

दरिया की पज़ीराई में शक तो नहीं लेकिन
इक लहर हो ऐसी भी कि उठ कर मुझे देखे

मैं बार दिगर ही कहीं आता हूँ समझ में
जो देखना चाहे सो मुकर्रर मुझे देखे

मेरा नज़र आना है 'ज़फ़र' बात ही कुछ और
जो देख नहीं सकता वो अक्सर मुझे देखे