उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhula baiThe nahin thi jo mohabbat bhulne wali

भुला बैठे नहीं थी जो मोहब्बत भूलने वाली

بھلا بیٹھے نہیں تھی جو محبت بھولنے والی

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भुला बैठे नहीं थी जो मोहब्बत भूलने वाली
और इतने थोड़े 'अर्से में वो सूरत भूलने वाली

हम इस में आप रहने लग गए तब जा के भूले हैं
वगर्ना कौन सी थी ये मुसीबत भूलने वाली

बहुत कुछ याद रखना अब तो अच्छा भी नहीं लगता
तक़ाज़ा 'उम्र का भी है ये 'आदत भूलने वाली

सभी कुछ याद है जो कुछ ज़रूरी था भुला देना
मिली है इतनी मुश्किल से ये मोहलत भूलने वाली

तुम्हीं कह दो कहाँ तक हम भी आख़िर दरगुज़र करते
कि होती भी नहीं कोई शिकायत भूलने वाली

नहीं है फ़र्क़ ऐसा भूलने और याद रखने में
मुझे अज़बर है सारी अपनी हालत भूलने वाली

'ज़फ़र' क़ुर्बान कर सकता हूँ मैं सौ हाफ़िज़े उस पर
मिली है अपनी क़िस्मत से जो ने'मत भूलने वाली