उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bekasi-e-shab-e-hijran ki mujhe tab nahin

बेकसी-ए-शब-ए-हिज्राँ की मुझे ताब नहीं

بیکسیٔ شب ہجراں کی مجھے تاب نہیں

शायर: Dagh Dehlvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बेकसी-ए-शब-ए-हिज्राँ की मुझे ताब नहीं
काश दुश्मन ही चले आएँ जो अहबाब नहीं

तुझ को ऐ बख़्त-ए-सियह आग लगा कर देखूँ
शब-ए-हिज्राँ में अगर जल्वा-ए-महताब नहीं

देख बुत-ख़ाने में तस्वीर का आलम ऐ शैख़
याँ मुसल्ला नहीं मिम्बर नहीं मेहराब नहीं

नामा-बर मुझ से ये कहता है कि तुम तो क्या हो
बादशह भी तो वहाँ क़ाबिल-ए-अलक़ाब नहीं

न मिले मुझ को मिरे हाल पे रोने वाले
ऐश कैसा कि यहाँ ग़म के भी अस्बाब नहीं

हाल-ए-दिल जिस से कहा उस ने कहा बस ख़ामोश
'दाग़' इस दर्द के सुनने की हमें ताब नहीं