उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bandhi hai bhains khunTe se na koi gae rakhte hain

बंधी है भैंस खूंटे से न कोई गाए रखते हैं

بندھی ہے بھینس کھونٹے سے نہ کوئی گائے رکھتے ہیں

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बंधी है भैंस खूंटे से न कोई गाए रखते हैं
मगर हम दूध के बारे में अपनी राय रखते हैं

बहार-ए-बोसा अब के वो भी साथ अपने नहीं लाया
सो हम भी उस के आगे आज ख़ाली चाय रखते हैं

निमट सकती नहीं इस 'उम्र में तो 'आशिक़ी हम से
ज़रा सा काम है जिस को बहुत फैलाए रखते हैं

हमारे दिल में ख़ुद रौनक़ हमारी है जिधर देखो
हम इस महफ़िल को अपने आप ही गरमाए रखते हैं

मोहब्बत का कोई अच्छा ज़माना आने वाला है
हम अपने आप को ये कह के भी बहलाए रखते हैं

झुलसना और सुस्ताना हमारा है जुदा सब से
हमारी धूप है अपनी हम अपने साए रखते हैं

ख़याल आ जाए जाने कब नई ता'मीर का हम को
सुख़न की ये हवेली एहतियातन ढाए रखते हैं

गदागर भी 'ज़फ़र' दिन रात हैं उस की मोहब्बत के
सर-ए-राहे मगर कश्कोल भी औंधाए रखते हैं