उर्दू शायरी · ग़ज़ल

band ghar ke kamre ki raushni nahin achchhi

बंद घर के कमरे की रौशनी नहीं अच्छी

بند گھر کے کمرے کی روشنی نہیں اچھی

शायर: Yashvardhan Mishra5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बंद घर के कमरे की रौशनी नहीं अच्छी
और जान हिजरत की तीरगी नहीं अच्छी

छोड़ कर यहाँ मुझ को जा रहा है तू शायद
बिन तिरे जो जीनी है ज़िंदगी नहीं अच्छी

बोलती है ये उन को रोकना नहीं जानाँ
झील जैसी आँखों की ख़ामुशी नहीं अच्छी

ग़म सहें रहें तन्हा आजिज़ी करें लेकिन
इश्क़ तेरे चेहरे पर बेबसी नहीं अच्छी

मानता हूँ अब तुम में ताब-ए-ग़म नहीं है पर
जन्म-दिन पे 'यश्वर्धन' ख़ुद-कुशी नहीं अच्छी