उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baiTh ja kar sar-e-mimbar waiz

बैठ जा कर सर-ए-मिंबर वा'इज़

بیٹھ جا کر سر منبر واعظ

शायर: Jaleel Manikpuri15 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बैठ जा कर सर-ए-मिंबर वा'इज़
हो गया तू तो मिरे सर वा'इज़

मय तो जाएज़ नहीं ये जाएज़ है
रोज़ खाता है मिरा सर वा'इज़

बंद करता है दर-ए-तौबा क्यूँ
खोल कर वा'ज़ का दफ़्तर वा'इज़

वाइ'ज़ों की मैं करूँ क्या ता'रीफ़
घर में मय-ख़्वार हैं बाहर वा'इज़

मय-कशों ही के लिए है ये बात
जो है दिल में वही लब पर वा'इज़

देख किस रंग से उट्ठी है घटा
तह कर अब वा'ज़ का दफ़्तर वा'इज़

किस तरह पीते हैं पीने वाले
देख लेना लब-ए-कौसर वा'इज़

मौत भी आती है तो हीले से
आ गया रिंदों में क्यूँकर वा'इज़

सख़्तियाँ रिंदों पे करते करते
'अक़्ल पर पड़ गए पत्थर वा'इज़

आतिश-ए-तर का जो पड़ जाए मज़ा
फूँक दे वा'ज़ का दफ़्तर वा'इज़

रिंद आपे से जो बाहर हैं तो हों
तू न हो जामे से बाहर वा'इज़

शीशा-ए-दिल का ख़ुदा हाफ़िज़ है
तेरी हर बात है पत्थर वा'इज़

ज़िक्र-ए-मय वा'ज़ में जब आता है
झूमता है सर-ए-मिंबर वा'इज़

ले के आँखों से लगाता साग़र
पढ़ जो लेता ख़त-ए-साग़र वा'इज़

महफ़िल-ए-वाज़ में क्यूँ जाऊँ 'जलील'
हैं मुझे शीशा-ओ-साग़र वा'इज़