उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahut suljhi hui baaton ko bhi uljhae rakhte hain

बहुत सुलझी हुई बातों को भी उलझाए रखते हैं

بہت سلجھی ہوئی باتوں کو بھی الجھائے رکھتے ہیں

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बहुत सुलझी हुई बातों को भी उलझाए रखते हैं
जो है काम आज का कल तक उसे लटकाए रखते हैं

तग़ाफ़ुल सा रवा रखते हैं उस के सामने क्या क्या
मगर अंदर ही अंदर तब्अ को ललचाए रखते हैं

हमारी जुस्तुजू से दूर-तर है मंज़िल-ए-मअ'नी
उसी को खोए रखना है जिसे हम पाए रखते हैं

हमारी आरज़ू अपनी समझ में भी नहीं आती
पजामा इस तरह का है जिसे उलटाए रखते हैं

हवाएँ भूल कर भी इस तरफ़ का रुख़ नहीं करतीं
सो ये शाख़-ए-तमाशा आप ही थर्राए रखते हैं

इसी की रौशनी है और इसी में भस्म होना है
ये शोला शाम का जो रात भर भड़काए रखते हैं

हम इतनी रौशनी में देख भी सकते नहीं उस को
सो अपने आप ही इस चाँद को गहनाए रखते हैं

नशेब-ए-शाइरी में है हमारी ज़ात से रौनक़
यही पत्थर है जिस को रात दिन लुढ़काए रखते हैं

ये घर जिस का है उस ने वापस आना है 'ज़फ़र' इस में
इसी ख़ातिर दर-ओ-दीवार को महकाए रखते हैं