उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badla ye liya hasrat-e-izhaar se humne

बदला ये लिया हसरत-ए-इज़हार से हम ने

بدلہ یہ لیا حسرت اظہار سے ہم نے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदला ये लिया हसरत-ए-इज़हार से हम ने
आग़ाज़ किया अपने ही इंकार से हम ने

दरवाज़ा नहीं अपने सरोकार में शामिल
है राब्ता रक्खा हुआ दीवार से हम ने

इम्कान सा खोला हुआ साहिल की हवा पर
उम्मीद सी बाँधी हुई उस पार से हम ने

अपनी ही बिगाड़ी हुई सूरत के अलावा
कुछ और निकाला नहीं तूमार से हम ने

इस का भी कोई फ़ाएदा पहुँचा न किसी को
आसाँ जो बरामद किया दुश्वार से हम ने

मंज़िल जो हमारी थी कहीं रह गई पीछे
ये काम लिया तुंदी-ए-रफ़्तार से हम ने

ये धूप ही थी अपनी गुज़रगाह सो रक्खा
इक फ़ासला भी साया-ए-अश्जार से हम ने

जाँचा है किसी और तरीक़े से ये सब कुछ
परखा है किसी अपने ही मेआर से हम ने

उस की भी अदा की है 'ज़फ़र' आज तो क़ीमत
जो चीज़ ख़रीदी नहीं बाज़ार से हम ने