उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahar nahin raha kabhi andar nahin gaya

बाहर नहीं रहा कभी अन्दर नहीं गया

باہر نہیں رہا کبھی اندر نہیں گیا

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाहर नहीं रहा कभी अन्दर नहीं गया
इल्ज़ाम इस तरह का मिरे सर नहीं गया

ख़ाली ही लग रही थी मुझे सारी काएनात
जब तक कि अपने आप से मैं भर नहीं गया

बनते गए हैं मुझ में ही दीवार-ओ-बाम-ओ-दर
इक 'उम्र हो गई है कि मैं घर नहीं गया

जब तक मैं कूद ही न पड़ा उस में एक दम
पानी से इतनी देर मिरा डर नहीं गया

गुज़रा हूँ ज़िंदगी में कभी जिस से एक बार
मैं ऐसे रास्ते से मुकर्रर नहीं गया

आगे भी लोग थे मिरे पीछे भी सर-बसर
अफ़्सोस मैं किसी के बराबर नहीं गया

जीता हूँ अपने शोर की बुनियाद पर 'ज़फ़र'
नक़्क़ाद के सुकूत से मैं मर नहीं गया