उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bahar aaya hun bas itne hi KHasare ke liye

बाहर आया हूँ बस इतने ही ख़सारे के लिए

باہر آیا ہوں بس اتنے ہی خسارے کے لیے

शायर: Zafar Iqbal6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाहर आया हूँ बस इतने ही ख़सारे के लिए
ख़स कोई चाहिए सूरज के शरारे के लिए

कोई मंज़र मिरे अन्दर ही रवाँ रहता है
मैं कि आँखें नहीं रखता हूँ नज़ारे के लिए

आ कि मैं कर सकूँ इक रोज़ कहीं इस के सिपुर्द
अपनी तस्वीर बनाता हूँ सितारे के लिए

साँस लेने के लिए ताज़ा हवा चाहता हूँ
बे-घरी चाहिए है एक गुज़ारे के लिए

डरता रहता हूँ कि गिर जाऊँ न ख़ुद साथ उस के
रुक तो जाता हूँ तिरा बोझ उतारे के लिए

'इश्क़ टुकड़ों का सज़ा-वार नहीं है सो 'ज़फ़र'
बात उस शोख़ से करना कभी सारे के लिए