उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aur to kuchh hai aaj kaam na kaj

और तो कुछ है आज काम न काज

اور تو کچھ ہے آج کام نہ کاج

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

और तो कुछ है आज काम न काज
पूछिए चल के शा'इरी के मिज़ाज

रोज़ तक़रीर करती है छलनी
देखिए बोलता है किस दिन छाज

और तो मानता नहीं कोई
आप ही अपने सर पे रखिए ताज

कभी क़ालीन भी बिछाएँगे
अब तो इस ज़र्द घास पर ही बिराज

क्यों निकलता है बार बार बटन
कुछ खुला रह गया है शायद काज

ख़ूब है कल के साथ सोने से
बोसा एक आध ही सही पर आज

भला आगे वो पूछते कब थे
अब जो फ़ेहरिस्त से हुआ इख़राज

उस डली के तो हम नहीं गाहक
इस घड़ी का बताइए अलहाज

अब कहाँ जाइएगा जान-ए-'ज़फ़र'
होती जाती है गुमरही भी रिवाज