उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apna to mazhab hi is buniyaad pe qaim hai

अपना तो मज़हब ही इस बुनियाद पे क़ाइम है

اپنا تو مذہب ہی اس بنیاد پہ قائم ہے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपना तो मज़हब ही इस बुनियाद पे क़ाइम है
जो जितना मुतमव्विल है उतना ही मुजरिम है

बाढ़ ही सारा खेत खा गई अब किस से पूछें
महाचोर है जो भी वही हमारा हाकिम है

जो जितना भी फ़ासिक़ और मुनाफ़िक़ है देखो
उस का लब-ओ-लहजा उतना ही नर्म-ओ-मुलाइम है

चलिए कुछ बहरूप तो बदला है बेचारे ने
अन्दर से जाहिल पूरा बाहर से 'आलिम है

ग़ौर से उस का चेहरा देखो और क़यास करो
जो पहले होता था क्या ये वही मुलाज़िम है

पकड़ो उस को और ख़ुद ही उस की तफ़तीश करो
जो मोटी गर्दन वाला है तुम्हारा मुल्ज़िम है

कुछ भी कहना चाहते हो तो खुल कर कहो 'ज़फ़र'
इन हालात में सच्ची-सीधी बात ही लाज़िम है