उर्दू शायरी · ग़ज़ल

andhere chha rahe the ya ujala hone wala tha

अंधेरे छा रहे थे या उजाला होने वाला था

اندھیرے چھا رہے تھے یا اجالا ہونے والا تھا

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अंधेरे छा रहे थे या उजाला होने वाला था
दरीचा बादलों का ख़ाक पर वा होने वाला था

हवा ख़ुद से उलझने के लिए तय्यार थी जैसे
ज़रा सी देर में सारा तमाशा होने वाला था

कुछ अपने बोझ से ही टूट भी सकता था उस लम्हे
कि ख़ुद मैं जिस क़दर कम था ज़ियादा होने वाला था

हमारी ख़्वाहिश-ए-नाकाम का क्या दख़्ल है इस में
कि उतना हो चुका था काम जितना होने वाला था

हमें इक 'उम्र थी दरकार उस के पार करने को
हमारे दरमियाँ जो ख़्वाब दरिया होने वाला था

कसर कुछ रह गई थी जैसे पहली बार होने में
सो जो कुछ हो चुका था अब दुबारा होने वाला था

हमारे हक़ में अब क्या फ़ाएदा होने न होने से
बुरा होने को था या कोई अच्छा होने वाला था

'ज़फ़र' मैं बे-ख़बर सा लग रहा था आप ही वर्ना
मुझे मा'लूम था उस रात क्या क्या होने वाला था