उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajib tarah ka ek gham hai jaan se lipTa hua

अजीब तरह का इक ग़म है जाँ से लिपटा हुआ

عجیب طرح کا اک غم ہے جاں سے لپٹا ہوا

शायर: Ejaz Haidar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजीब तरह का इक ग़म है जाँ से लिपटा हुआ
बगूला जैसे कोई बादबाँ से लिपटा हुआ

मैं लिखने बैठूँ तो काग़ज़ ही भीग जाता है
वो शख़्स यूँ है मिरी दास्ताँ से लिपटा हुआ

तलब सुकून में करता हूँ बे-सुकूनी से
कि मेरा सूद है मेरे ज़ियाँ से लिपटा हुआ

मैं नींद में हूँ मगर ख़्वाब किस तरह देखूँ
मिरा शुऊ'र है मेरे गुमाँ से लिपटा हुआ

अगरचे नींद मुझे अब भी आ ही जाती है
मगर वो नींद कि सोता था माँ से लिपटा हुआ

बग़ैर पूछे मुझे रास्ता बताता है
कोई तो है कि मिरे कारवाँ से लिपटा हुआ