उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajab hi kya hai agar dhund mein ghubar mein hai

'अजब ही क्या है अगर धुँद में ग़ुबार में है

عجب ہی کیا ہے اگر دھند میں غبار میں ہے

शायर: Ejaz Ansari5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'अजब ही क्या है अगर धुँद में ग़ुबार में है
वो शख़्स अपने बनाए हुए हिसार में है

कहाँ है वक़्त अभी हम को दिल लगाने का
हमारी सोच अभी फ़िक्र-ए-रोज़गार में है

ग़मों के साए में ख़ुशियों के फूल महके हैं
ख़िज़ाँ का 'अक्स भी कुछ मौसम-ए-बहार में है

जो इक़्तिदार के लाइक़ न था किसी सूरत
सितम ये है कि वही शख़्स इक़्तिदार में है

ख़ुदा को करना है वापस रहे ख़याल 'ए'जाज़'
हमारे पास तो ये ज़िंदगी उधार में है