उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aisa wo be-shumar-o-qatar intizar tha

ऐसा वो बे-शुमार-ओ-क़तार इंतिज़ार था

ایسا وہ بے شمار و قطار انتظار تھا

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ऐसा वो बे-शुमार-ओ-क़तार इंतिज़ार था
पहली ही बार दूसरी बार इंतिज़ार था

ख़ामोशी-ए-ख़िज़ाँ थी चमन-दर-चमन तमाम
शाख़-ओ-शजर में शोर-ए-बहार इंतिज़ार था

देखा तो ख़ल्वत-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक ख़्वाब में
रौशन कोई चराग़-ए-शरार इंतिज़ार था

बाहर भी गर्द उमीद की उड़ती थी दूर दूर
अंदर भी चारों-सम्त ग़ुबार इंतिज़ार था

फैले हुए वो घास के तख़्ते न थे वहाँ
दर-अस्ल एक सिलसिला-वार इंतिज़ार था

कोई ख़बर थी आमद-ओ-इम्कान-ए-सुब्ह की
और उस के इर्द-गिर्द हिसार इंतिज़ार था

किस के गुमान में थे नए मौसमों के रंग
किस का मिरे सिवा सरोकार इंतिज़ार था

उमडा हुआ हुजूम-ए-तमाशा था दाएँ-बाएँ
तन्हा थीं आँखें और हज़ार इंतिज़ार था

चक्कर थे पाँव में कोई शाम-ओ-सहर 'ज़फ़र'
ऊपर से मेरे सर पे सवार इंतिज़ार था