उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aashiq hai jo tumhaare ruKH-e-surKH-rang ka

'आशिक़ है जो तुम्हारे रुख़-ए-सुर्ख़-रंग का

عاشق ہے جو تمہارے رخ سرخ رنگ کا

शायर: Maatam Fazl Mohammad11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'आशिक़ है जो तुम्हारे रुख़-ए-सुर्ख़-रंग का
रहता है उस को नश्शा शराब-ए-फ़रंग का

कहते हैं लोग देख तेरे रुख़ पे ख़ाल को
क्या हुक्म रोम में है सिपहदार ज़ंग का

ऐ रश्क-ए-हूर वुसअत-ए-जन्नत में भी मुझे
तुझ बिन है बे-गुमान यक़ीं गोर-ए-तंग का

जब से पतंग हूँ मैं तिरे शम'-रू का यार
मा'लूम था न तुझ को उड़ाना पतंग का

ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न होता तो रखता मैं ऐ सनम
'अर्श-ए-'अज़ीम नाम तुम्हारे पलंग का

ऐ सब्ज़-रंग मस्त-ए-मय-ए-इश्क़-ओ-हुस्न तो
अफ़यूँ को पूछते नहीं क्या ज़िक्र भंग का

ख़ाल-ए-रुख़-ए-निगार हैं चेहरे ख़याल में
बीनी दिखाई दे है दोनाली तुफ़ंग का

मातम मिरा है यार सिवा हम को बज़्म-ए-नूर
साैत-ए-बुका से कम नहीं आवाज़ चंग का

आतिश का शे'र पढ़ता हूँ अक्सर ब-हस्ब-ए-हाल
दिल सैद है वो बहर-ए-सुख़न के नहंग का

वो चश्म घात में दिल-ए-पुर-दाग़ के नहीं
आहू को है इरादा शिकार-ए-पलंग का

नामूस का तो फ़िक्र है 'मातम' 'अबस यहाँ
ये 'इश्क़ ख़स्म नाम का दुश्मन है नंग का