उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aarif hai wo jo husn ka juya jahan mein hai

'आरिफ़ है वो जो हुस्न का जूया जहाँ में है

عارف ہے وہ جو حسن کا جویا جہاں میں ہے

शायर: Haidar Ali Aatish20 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'आरिफ़ है वो जो हुस्न का जूया जहाँ में है
बाहर नहीं है यूसुफ़ इसी कारवाँ में है

पीरी में शग़्ल-ए-मय है जवानाना रोज़-ओ-शब
बू-ए-बहार आती हमारी ख़िज़ाँ में है

होता है गुल के सूँघे से दूना गिरफ़्ता दिल
मुझ सा भी बद-दिमाग़ कम इस बोस्ताँ में है

पुश्त-ए-ख़मीदा देख के होता हूँ ना'रा-ज़न
करता हूँ सर्फ़-ए-तीर जो ज़ोर इस कमाँ में है

दिखला रही है दिल की सफ़ा दो-जहाँ की सैर
क्या आईना लगा हुआ अपने मकाँ में है

दीवाना जो न 'इश्क़ से हो आदमी नहीं
हुस्न-परी का जल्वा तिलिस्म-ए-जहाँ में है

परवानों की तरह है हुजूम-ए-क़दह-कशाँ
रौशन चराग़-ए-बादा जो मुग़ की दुकाँ में है

उस दिलरुबा के कूचे में आगे हवा से जाए
इतनी तो जान अब भी तन-ए-ना-तवाँ में है

दुनिया से कूच करना है इक रोज़ रहरवो
बाँग-ए-जरस से शोर यही कारवाँ में है

पढ़ सकता सरनविश्त का मतलब कोई नहीं
मा'लूम कुछ नहीं कि ये ख़त किस ज़बाँ में है

आइंदा-ओ-रविंदा की चलती हैं ठोकरें
जादा जो अपना था उसी ख़्वाब-ए-गिराँ में है

कुश्ते हैं बाग़ में भी तिरी तेग़-ए-नाज़ के
बू-ए-शहीद लाला में और अर्ग़वाँ में है

'आशिक़ के रंग-ए-ज़र्द को देखो तो हँस पड़ो
तासीर उस में भी है वो जो ज़ाफ़राँ में है

मा'दूम वो कमर है न मौहूम वो दहन
कहते हैं शा'इर उन के जो कुछ कुछ गुमाँ में है

गुल टूटते हैं होते हैं बुलबुल असीर-ए-दाम
सय्याद मुस्त'इद मदद-ए-बाग़बाँ में है

सरकश की मंज़िलत है सुबुक पेश-ए-ख़ाकसार
वो तमकनत ज़मीं की कहाँ आसमाँ में है

सुम्बुल से हाल-ए-गुल हूँ मैं ये कह के पूछता
किस सिलसिले में तू है ये किस ख़ानदाँ में है

दिल में ख़याल-ए-गेसू-ए-मुश्कीं है बद बला
ये मुर्ग़-ए-रूह के लिए साँप आशियाँ में है

हिकमत से है ये ख़ाक का पुतला बना हुआ
नूर आँख में है उस के तो मग़्ज़ उस्तुख़्वाँ में है

'आतिश' बुलंद-पाया है दरगाह यार की
हफ़्तुम फ़लक की रिफ़'अत इसी आस्ताँ में है