नात लिरिक्स

Ye Waqar-o-Shan Ye Shaukat Rasoolullah Ki | Arsh-e-Haq Hai With Tazmeen

ये वक़ार-ओ-शान ये शौकत रसूलुल्लाह की | अर्श-ए-हक़ है तज़मीन के साथ

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

ये वक़ार-ओ-शान ये शौकत रसूलुल्लाह कीये हुकूमत और ये सतवत रसूलुल्लाह कीशान-ए-लौलाका-लमा ख़िल'अत रसूलुल्लाह की'अर्श-ए-हक़ है मसनद-ए-रिफ़'अत रसूलुल्लाह कीदेखनी है हश्र में 'इज़्ज़त रसूलुल्लाह की

किस-क़दर पुर-नूर है सूरत रसूलुल्लाह कीदीद-ए-हक़ है बिल-यक़ीं रूयत रसूलुल्लाह कीमरहबा ये शान ये 'अज़मत रसूलुल्लाह की'अर्श-ए-हक़ है मसनद-ए-रिफ़'अत रसूलुल्लाह कीदेखनी है हश्र में 'इज़्ज़त रसूलुल्लाह की

फूटेंगे कुंज-ए-लहद से अपनी सौत-ए-नूर केझिलमिलाएँगे शब-ए-मरक़द में लम'ए नूर केइस-क़दर भर जाएँगे बर्ज़ख़ में जल्वे नूर केक़ब्र में लहराएँगे ता-हश्र चश्मे नूर केजल्वा फ़रमा होगी जब तल'अत रसूलुल्लाह की

हू-ब-हू कहर-ए-ख़ुदा-ए-पाक थी बर्क़-ए-ग़ज़बपूछ उन का क्या हुआ जिन पर पड़ी बर्क़-ए-ग़ज़बअल्लाह अल्लाह ख़ाक हस्ती कर गई बर्क़-ए-ग़ज़बकाफ़िरों पर तेग़-ए-वाला से गिरी बर्क़-ए-ग़ज़बअब्र आसा छा गई हैबत रसूलुल्लाह की

देख ले तू दामन-ए-ख़ैरात क्या उन से मिलादो-जहाँ उन से मिले, बे-इंतिहा उन से मिलाइस से आगे और क्या बोलूँ ख़ुदा उन से मिलाला-व-रब्बिल-'अर्श जिस को जो मिला उन से मिलाबटती है कौनैन में ने'मत रसूलुल्लाह की

ठोकरें खाता रहा जो उन से मुस्तग़नी हुआलाइक़-ए-'इबरत बना जो उन से मुस्तग़नी हुआहो के बे-ईमाँ मरा जो उन से मुस्तग़नी हुआवो जहन्नम में गया जो उन से मुस्तग़नी हुआहै ख़लीलुल्लाह को हाजत रसूलुल्लाह की

दर-ब-दर फिरता रहा जो उन से मुस्तग़नी हुआहर जगह रुस्वा हुआ जो उन से मुस्तग़नी हुआराह-ए-जन्नत से फिरा जो उन से मुस्तग़नी हुआवो जहन्नम में गया जो उन से मुस्तग़नी हुआहै ख़लीलुल्लाह को हाजत रसूलुल्लाह की

हम ने सीखे हैं इसी मकतब से आदाब-ए-हुज़ूरहम इसी मय-ख़ाने से पीते हैं मय-ए-नाब-ए-हुज़ूरहर जगह पहचान है अपनी शिफ़ायाब-ए-हुज़ूरअहल-ए-सुन्नत का है बेड़ा पार, असहाब-ए-हुज़ूरनज्म हैं और नाओ है 'इत्रत रसूलुल्लाह की

हम वो ख़ुश-क़िस्मत हैं उन की याद में रोना मिलाऔर सिले में आँख को दीदार का होना मिलाक़ब्र ऐसी ख़ुल्द का जैसे कोई कोना मिलाख़ाक हो कर 'इश्क़ में आराम से सोना मिलाजान की इक्सीर है उल्फ़त रसूलुल्लाह की

मा-वरा इदराक से है हुस्न-ए-आ'ज़ा-ए-हुज़ूरआप का हम-सर कहाँ से कोई ले आए हुज़ूरआप क्या हैं कौन समझे कौन समझाए हुज़ूरहै गुल-ए-बाग़-ए-क़ुदुस रुख़्सार-ए-ज़ेबा-ए-हुज़ूरसर्व-ए-गुलज़ार-ए-क़िदम क़ामत रसूलुल्लाह की

वैसे तो, राज़ी ! हर इक इंसाँ है मद्दाह-ए-हुज़ूरएक इक ये गोशा-ए-इम्काँ है मद्दाह-ए-हुज़ूरहर ज़बान-ओ-हर-दिल-ए-हैराँ है मद्दाह-ए-हुज़ूरऐ रज़ा ! ख़ुद साहिब-ए-क़ुरआँ है मद्दाह-ए-हुज़ूरतुझ से कब मुमकिन है फिर मिदहत रसूलुल्लाह की

कलाम:इमाम अहमद रज़ा ख़ान

तज़मीन:मीर्ज़ा अमजद राज़ीओवैस रज़ा क़ादरी

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