नात लिरिक्स

Wo Ghaus-ul-wara Aaftab-e-Wilayat Ki Chaukhat Pe Jane Ko Ji Chahta Hai

वो ग़ौस-उल-वरा आफ़ताब-ए-विलायत की चौखट पे जाने को जी चाहता है

नात ख़्वान: अब्दुल मुस्तफ़ा रज़वी अदोनीशायर: मुहम्मद अय्यूब रज़ा अमजदीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ग़ौस-उल-वरा आफ़ताब-ए-विलायत की चौखट पे जाने को जी चाहता हैदर-ए-ग़ौस-ए-कौनैन पे जा के अपना मुक़द्दर जगाने को जी चाहता है

इशारे पे तेरे उभर आई कश्ती, जो बारह बरस क़ब्ल ग़र्क़ हुई थीतेरी शान-ओ-शौकत के आगे सर-ए-दिल मेरा अब झुकाने को जी चाहता है

मेरे ग़ौस का हर-सू ज़िक्र-ए-जली हो, हवा क़ादरियत की हर-सू चली होमुझे ग़ौस-ए-कौनैन की ग्यारहवीं में यूँ धूमें मचाने को जी चाहता है

बड़ा दर्द देते हैं ये दुनिया वाले, ख़ुदा-रा मुझे अपने दर पर बुला लेमेरे ग़ौस ! अब हाल-ए-दिल अपना रो रो के तुझ को सुनाने को जी चाहता है

तेरे नाम का विर्द क्यूँ न करूँ मैं, तेरी ज़ात-ए-हक़ पर न क्यूँकर मरूँ मैंतू है आइना जल्वा-ए-मुस्तफ़ा का, तेरा फ़ैज़ पाने को जी चाहता है

यही 'अर्ज़ करता है अय्यूब बिल्कुल, बना लो इसे अपने गुलशन का बुलबुलऐ ग़ौस-उल-वरा ! तेरी मिदहत का नग़्मा यूँही गुनगुनाने को जी चाहता है

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