वाह ! क्या शान है, ए ताज-ए-शरी'अत ! तेरीऊँचे ऊँचों की ज़ुबाँ पर भी है मिदहत तेरी
सुन्नत-ए-सरवर-ए-'आलम पे 'अमल था तेरा'इश्क़-ए-सरकार से मा'मूर थी सीरत तेरी
हज़रत-ए-मुफ़्ती-ए-आ'ज़म की करामत तू हैफिर न क्यूँ हिन्द में हर सम्त हो शोहरत तेरी
दिल को दीवाना बनाए तेरा शीरीं-लहजाआँख भर आती है सुन कर के ख़िताबत तेरी
अल्लाह अल्लाह ! मेरे पीर ! तेरा हुस्न-ओ-जमालआज भी नक़्श मेरे दिल पे है सूरत तेरी
देख कर तेरी झलक दिल को सुकूँ मिलता थादिल पे बिजली सी गिरी जब हुई रेहलत तेरी
जा-नशीं मुफ़्ती-ए-आ'ज़म ने बनाया अपनादेख कर 'इल्म-ओ-'अमल और शराफ़त तेरी
फ़ज़्ल-ए-रब से तेरे दीवानों को हो जाती हैतेरे शहज़ादे की सूरत में ज़ियारत तेरी
काश ! 'आसिम के भी हालात पे हो जाए कभीए सख़ी इब्न-ए सख़ी ! नज़र-ए-'इनायत तेरी
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