नात लिरिक्स

Wah Kya Martaba Aye Ghous Hai Bala Tera

वाह क्या मर्तबा ऐ ग़ौस है बाला तेरा

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: इमाम अहमद रज़ा ख़ानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

वाह ! क्या मर्तबा, ऐ ग़ौस ! है बाला तेराऊँचे ऊँचों के सरों से क़दम आ'ला तेरा

सर भला क्या कोई जाने कि है कैसा तेराऔलिया मलते हैं आँखें वो है तल्वा तेरा

क्या दबे जिस पे हिमायत का हो पंजा तेराशेर को ख़तरे में लाता नहीं कुत्ता तेरा

तू हुसैनी-हसनी क्यूँ न मुहिय्युद्दीं होऐ ख़िज़र ! मज्म'-ए-बहरैन है चश्मा तेरा

क़समें दे दे के खिलाता है, पिलाता है तुझेप्यारा अल्लाह तेरा, चाहने वाला तेरा

मुस्तफ़ा के तन-ए-बे-साया का साया देखाजिस ने देखा मेरी जाँ जल्वा-ए-ज़ेबा तेरा

इब्न-ए-ज़हरा को मुबारक हो 'अरूस-ए-क़ुदरतक़ादिरी पाएँ तसद्दुक़, मेरे दूल्हा ! तेरा

क्यूँ न क़ासिम हो कि तू इब्न-ए-अबिल-क़ासिम हैक्यूँ न क़ादिर हो कि मुख़्तार है बाबा तेरा

नबवी मींह, 'अलवी फ़स्ल, बतूली गुलशनहसनी फूल, हुसैनी है महकना तेरा

नबवी ज़िल, 'अलवी बुर्ज, बतूली मंज़िलहसनी चाँद, हुसैनी है उजाला तेरा

नबवी ख़ुर, 'अलवी कोह, बतूली मा'दिनहसनी ला'ल, ह़ुसैनी है तजल्ला तेरा

बहर-ओ-बर, शहर-ओ-क़ुरा, सहल-ओ-हुज़ुन, दश्त-ओ-चमनकौन से चक पे पहुँचता नहीं दा'वा तेरा

हुस्न-ए-निय्यत हो ख़ता फिर कभी करता ही नहींआज़माया है, यगाना है दोगाना तेरा

'अर्ज़-ए-अहवाल की प्यासों में कहाँ ताब मगरआँखें, ऐ अब्र-ए-करम ! तक्ती हैं रस्ता तेरा

मौत नज़्दीक, गुनाहों की तहें, मैल के ख़ौलआ बरस जा कि नहा धो ले ये प्यासा तेरा

आब आमद वो कहे और मैं तयम्मुम बरख़ास्तमुश्त-ए-ख़ाक अपनी हो और नूर का अहला तेरा

जान तो जाते ही जाएगी क़ियामत ये हैकि यहाँ मरने पे ठहरा है नज़्ज़ारा तेरा

तुझ से दर, दर से सग और सग से है मुझ को निस्बतमेरी गर्दन में भी है दूर का डोरा तेरा

इस निशानी के जो सग हैं, नहीं मारे जातेहश्र तक मेरे गले में रहे पट्टा तेरा

मेरी क़िस्मत की क़सम खाएँ सगान-ए-बग़दादहिन्द में भी हूँ तो देता रहूँ पहरा तेरा

तेरी 'इज़्ज़त के निसार, ऐ मेरे ग़ैरत वाले !आह सद आह कि यूँ ख़्वार हो बिरवा तेरा

बद सही, चोर सही, मुजरिम-ओ-नाकारा सहीऐ वो कैसा ही सही है तो, करीमा ! तेरा

मुझ को रुस्वा भी अगर कोई कहेगा तो यूँ हीकि वही ना, वो रज़ा बंदा-ए-रुस्वा तेरा

हैं रज़ा यूँ न बिलक तू नहीं जय्यिद तो न होसय्यिद-ए-जय्यिद-ए-हर-दहर है मौला तेरा

फ़ख़्र-ए-आक़ा में, रज़ा ! और भी इक नज़्म-ए-रफ़ी'चल लिखा लाएँ सना-ख़्वानों में चेहरा तेरा

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