नात लिरिक्स

Subh Taiba Mein Hui Bat.ta Hai Bada Noor Ka | Qaseeda-e-Noor

सुब्ह तयबा में हुई बटता है बाड़ा नूर का | क़सीदा-ए-नूर

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: इमाम अहमद रज़ा ख़ानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सुब्ह तयबा में हुई बटता है बाड़ा नूर कासदक़ा लेने नूर का आया है तारा नूर का

बाग़-ए-तयबा में सुहाना फूल फूला नूर कामस्त-ए-बू हैं बुलबुलें पढ़ती हैं कलिमा नूर का

बारहवीं के चाँद का मुजरा है सज्दा नूर काबारह बुर्जों से झुका एक इक सितारा नूर का

उन के क़स्र-ए-क़द्र से ख़ुल्द एक कमरा नूर कासिदरा पाएँ बाग़ में नन्हा सा पौदा नूर का

'अर्श भी, फ़िरदौस भी उस शाह-ए-वाला नूर काये मुसम्मन बुर्ज, वो मुश्कू-ए-आ'ला नूर का

आई बिद'अत, छाई ज़ुल्मत, रंग बदला नूर कामाह-ए-सुन्नत मेहर-ए-तल'अत ! ले ले बदला नूर का

तेरे ही माथे रहा, ऐ जान ! सेहरा नूर काबख़्त जागा नूर का, चमका सितारा नूर का

मैं गदा तू बादशाह भर दे पियाला नूर कानूर दिन दूना तिरा, दे डाल सदक़ा नूर का

तेरी ही जानिब है पाँचों वक़्त सज्दा नूर कारुख़ है क़िब्ला नूर का, अब्रू है का'बा नूर का

पुश्त पर ढलका सर-ए-अनवर से शम्ला नूर कादेखें मूसा तूर से उतरा सहीफ़ा नूर का

ताज वाले ! देख कर तेरा 'इमामा नूर कासर झुकाते हैं इलाही बोल-बाला नूर का

बीनि-ए-पुर-नूर पर रख़्शाँ है बुक्का नूर काहै लिवाउल-हम्द पर उड़ता फरेरा नूर का

मुस्हफ़-ए-'आरिज़ पे है ख़त्त-ए-शफ़ी'आ नूर कालो, सियाह-कारो ! मुबारक हो क़बाला नूर का

आब-ए-ज़र बनता है 'आरिज़ पर पसीना नूर कामुस्हफ़-ए-ए'जाज़ पर चढ़ता है सोना नूर का

पेच करता है फ़िदा होने को लम'आ नूर कागिर्द-ए-सर फिरने को बनता है 'इमामा नूर का

हैबत-ए-'आरिज़ से थर्राता है शो'ला नूर काकफ़्श-ए-पा पर गिर के बन जाता है गुफ्फा नूर का

शम'अ दिल, मिश्कात तन, सीना ज़ुजाजा नूर कातेरी सूरत के लिए आया है सूरा नूर का

मैल से किस दर्जा सुथरा है वो पुतला नूर काहै गले में आज तक कोरा ही कुर्ता नूर का

तेरे आगे ख़ाक पर झुकता है माथा नूर कानूर ने पाया तिरे सज्दे से सीमा नूर का

तू है साया नूर का, हर 'उज़्व टुकड़ा नूर कासाए का साया न होता है न साया नूर का

क्या बना नाम-ए-ख़ुदा असरा का दूल्हा नूर कासर पे सेहरा नूर का, बर में शहाना नूर का

बज़्म-ए-वहदत में मज़ा होगा दोबाला नूर कामिलने शम'-ए-तूर से जाता है इक्का नूर का

वस्फ़-ए-रुख़ में गाती हैं हूरें तराना नूर काक़ुदरती बीनों में क्या बजता है लहरा नूर का

ये किताब-ए-कुन में आया तुर्फ़ा आया नूर काग़ैर-ए-क़ाइल कुछ न समझा कोई मा'ना नूर का

देखने वालों ने कुछ देखा न भाला नूर का"मन रआ" कैसा ये आईना दिखाया नूर का

सुब्ह कर दी कुफ़्र की सच्चा था मुज़्दा नूर काशाम ही से था शब-ए-तीरा को धड़का नूर का

पड़ती है नूरी भरन, उमडा है दरिया नूर कासर झुका, ऐ किश्त-ए-कुफ़्र ! आता है अहला नूर का

नारियों का दौर था दिल जल रहा था नूर कातुम को देखा हो गया ठंडा कलेजा नूर का

नस्ख़-ए-अदयाँ कर के ख़ुद क़ब्ज़ा बिठाया नूर काताजवर ने कर लिया कच्चा 'इलाक़ा नूर का

जो गदा देखो लिए जाता है तोड़ा नूर कानूर की सरकार है क्या इस में तोड़ा नूर का

भीक ले सरकार से ला जल्द कासा नूर कामाह-ए-नौ ! तयबा में बटता है महीना नूर का

देख इन के होते ना-ज़ेबा है दा'वा नूर कामेहर लिख दे याँ के ज़र्रों को मुचल्का नूर का

याँ भी दाग़-ए-सज्दा-ए-तयबा है तमग़ा नूर काऐ क़मर ! क्या तेरे ही माथे है टीका नूर का

शम'अ साँ एक एक परवाना है उस बा नूर कानूर-ए-हक़ से लौ लगाए दिल में रिश्ता नूर का

अंजुमन वाले हैं अंजुम बज़्म हल्क़ा नूर काचाँद पर तारों के झुरमट से है हाला नूर का

तेरी नस्ल-ए-पाक में है बच्चा बच्चा नूर कातू है 'ऐन-ए-नूर तेरा सब घराना नूर का

नूर की सरकार से पाया दोशाला नूर काहो मुबारक तुम को, ज़ुन्नूरैन ! जोड़ा नूर का

किस के पर्दे ने किया आईना अँधा नूर कामाँगता फिरता है आँखें हर नगीना नूर का

अब कहाँ वो ताबिशें, कैसा वो तड़का नूर कामेहर ने छुप कर किया ख़ासा धुँदल्का नूर का

तुम मुक़ाबिल थे तो पहरों चाँद बढ़ता नूर कातुम से छुट कर मुँह निकल आया ज़रा सा नूर का

क़ब्र-ए-अनवर कहिए या क़स्र-ए-मु'अल्ला नूर काचर्ख़-ए-अतलस या कोई सादा सा क़ुब्बा नूर का

आँख मिल सकती नहीं दर पर है पहरा नूर काताब है बे-हुक्म पर मारे परिंदा नूर का

नज़'अ में लौटेगा ख़ाक-ए-दर पे शैदा नूर कामर के ओढ़ेगी 'अरूस-ए-जाँ दो-पट्टा नूर का

ताब-ए-मेहर-ए-हश्र से चौंके न कुश्ता नूर काबूंदियाँ रहमत की देने आईं छींटा नूर का

वज़'-ए-वाज़े' में तिरी सूरत है मा'ना नूर कायूँ मजाज़न चाहें जिस को कह दें कलिमा नूर का

अंबिया अज्ज़ा हैं, तू बिल्कुल है जुमला नूर काइस 'इलाक़े से है उन पर नाम सच्चा नूर का

ये जो मेहर-ओ-मह पे है इतलाक़ आता नूर काभीक तेरे नाम की है इस्ति'आरा नूर का

सुरमगीं आँखें हरीम-ए-हक़ के वो मुश्कीं ग़ज़ालहै फ़ज़ा-ए-ला-मकाँ तक जिन का रमना नूर का

ताब-ए-हुस्न-ए-गर्म से खिल जाएँगे दिल के कँवलनौ-बहारें लाएगा गर्मी का झलका नूर का

ज़र्रे मेहर-ए-क़ुद्स तक तेरे तवस्सुत से गएहद्द-ए-औसत ने किया सुग़रा को कुबरा नूर का

सब्ज़ा-ए-गर्दूं झुका था बहर-ए-पा-बोस-ए-बुराक़फिर न सीधा हो सका खाया वो कोड़ा नूर का

ताब-ए-सुम से चौंधिया कर चाँद उन्हीं क़दमों फिराहँस के बिजली ने कहा, देखा छलावा नूर का

दीद-ए-नक़्श-ए-सुम को निकली सात पर्दों से निगाहपुतलियाँ बोलीं चलो आया तमाशा नूर का

'अक्स-ए-सुम ने चाँद-सूरज को लगाए चार चाँदपड़ गया सीम-ओ-ज़र-ए-गर्दूं पे सिक्का नूर का

चाँद झुक जाता जिधर उँगली उठाते महद मेंक्या ही चलता था इशारों पर खिलौना नूर का

एक सीने तक मुशाबेह, इक वहाँ से पाउँ तकहुस्न-ए-सिब्तैन इन के जामों में है नीमा नूर का

साफ़ शक्ल-ए-पाक है दोनों के मिलने से 'इयाँख़त्त-ए-तौअम में लिखा है ये दो वर्क़ा नूर का

काफ़ गेसू, हा दहन, या अब्रू, आँखें 'ऐन-सादकाफ़-हा-या-'ऐन-साद उन का है चेहरा नूर का

ऐ रज़ा ! ये अहमद-ए-नूरी का फ़ैज़-ए-नूर हैहो गई मेरी ग़ज़ल बढ़ कर क़सीदा नूर का

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