नात लिरिक्स

Rukh Din Hai Ya Mehr-e-sama Ye Bhi Nahin Wo Bhi Nahin

रुख़ दिन है या मेहर-ए-समा ये भी नहीं वो भी नहीं

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: इमाम अहमद रज़ा ख़ानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

रुख़ दिन है या मेहर-ए-समा, ये भी नहीं वो भी नहींशब ज़ुल्फ़ या मुश्क-ए-ख़ुता, ये भी नहीं वो भी नहीं

मुम्किन में ये क़ुदरत कहाँ, वाजिब में 'अब्दिय्यत कहाँहैराँ हूँ ये भी है ख़ता, ये भी नहीं वो भी नहीं

हक़ ये कि हैं 'अब्द-ए-इलाह और 'आलम-ए-इम्काँ के शाहबर्ज़ख़ हैं वो सिर्र-ए-ख़ुदा, ये भी नहीं वो भी नहीं

बुलबुल ने गुल उन को कहा, क़ुमरी ने सर्व-ए-जाँ-फ़िज़ाहैरत ने झुँझला कर कहा, ये भी नहीं वो भी नहीं

ख़ुर्शीद था किस ज़ोर पर, क्या बढ़ के चमका था क़मरबे-पर्दा जब वो रुख़ हुआ, ये भी नहीं वो भी नहीं

डर था कि 'इस्याँ की सज़ा, अब होगी या रोज़-ए-जज़ादी उन की रहमत ने सदा, ये भी नहीं वो भी नहीं

कोई है नाज़ाँ ज़ोहद पर, या हुस्न-ए-तौबा है सिपरयाँ है फ़क़त तेरी 'अता, ये भी नहीं वो भी नहीं

दिन लह्व में खोना तुझे, शब सुब्ह तक सोना तुझेशर्म-ए-नबी ख़ौफ़-ए-ख़ुदा, ये भी नहीं वो भी नहीं

रिज़्क़-ए-ख़ुदा खाया किया, फ़रमान-ए-हक़ टाला कियाशुक्र-ए-करम तर्स-ए-सज़ा, ये भी नहीं वो भी नहीं

है बुलबुल-ए-रंगीं रज़ा, या तूती-ए-नग़्मा-सराहक़ ये कि वासिफ़ है तेरा, ये भी नहीं वो भी नहीं

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