नात लिरिक्स

Roz-o-Shab Josh Pe Rahmat Ka Hai Dariya Tera | Tazmeen of Waah ! Kya Jood-o-Karam Hai, Shah-e-Bat.ha Tera

रोज़-ओ-शब जोश पे रहमत का है दरिया तेरा | तज़मीन - वाह ! क्या जूद-ओ-करम है, शह-ए-बतहा ! तेरा

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

रोज़-ओ-शब जोश पे रहमत का है दरिया तेरासदक़े इस शान-ए-सख़ावत पे ये मँगता तेराहाथ उट्ठे भी न थे और मिल गया सदक़ा तेरावाह ! क्या जूद-ओ-करम है, शह-ए-बतहा ! तेरानहीं सुनता ही नहीं माँगने वाला तेरा

वो हक़ीक़त तेरी, जिब्रील जिसे न जानेंकिस तरह लोग भला रुत्बा तुम्हारा जानेंतोड़ दे लिख के कलम यूँ ही, जो लिखना जानेंफ़र्श वाले तेरी शौकत का 'उलू क्या जानें !ख़ुसरवा ! 'अर्श पे उड़ता है फरेरा तेरा

चाँदनी रात में जाबिर का नज़ारा देखेंचाँद को वो कभी सरकार का चेहरा देखेंदेख कर बोलें, जमाल-ए-शह-ए-वाला देखेंतेरे क़दमों में जो हैं ग़ैर का मुँह क्या देखेंकौन नज़रों पे चढ़े देख के तल्वा तेरा

न कोई तुझ सा सख़ी है, न कोई मुझ सा ग़रीबचश्म-ए-बेदार ! जगा दे मेरे ख़्वाबीदा-नसीबहै रिज़ा तेरी, रिज़ा रब की, तुम इतने हो क़रीबमैं तो मालिक ही कहूँगा कि हो मालिक के हबीबया’नी महबूब-ओ-मुहिब में नहीं मेरा तेरा

तेरी ख़ैरात का इक ज़र्रा करे हम को निहालकिस तरह जाएँ किसी और के दर बहर-ए-सुवालसिलसिला अपनी 'अताओं का यूँही रखना बहालतेरे टुकड़ों से पले ग़ैर की ठोकर पे न डालझिड़कियाँ खाएँ कहाँ छोड़ के सदक़ा तेरा

गर गुनाहों के सबब तुम ने दिया दर से निकालइस तसव्वुर से ही हो जाएँ तेरे बंदे निढालकौन रखेगा तेरी तरह फ़क़ीरों का ख़यालतेरे टुकड़ों से पले ग़ैर की ठोकर पे न डालझिड़कियाँ खाएँ कहाँ छोड़ के सदक़ा तेरा

तुझ को बख़्शी तेरे मा'बूद ने अज़मत कितनीबख़्शी जाएगी तेरे सदक़े में उम्मत कितनीवाँ नज़र आएगी कौसर में है कसरत कितनीएक मैं क्या ! मेरे 'इस्याँ की हक़ीक़त कितनीमुझ से सौ लाख को काफ़ी है इशारा तेरा

तू जो सहरा में क़दम रख दे, वहाँ फूल खिलेंऔर जबल सोने के, चाँदी के तेरे साथ चलेंतू जो चाहे तो सभी ग़म मेरे ख़ुशियों में ढलेतू जो चाहे तो अभी मैल मेरे दिल के धुलेंकि ख़ुदा दिल नहीं करता कभी मैला तेरा

अज़ प-ए-ख़ालिक़-ओ-रहमान-ओ-वली कर दे, कि हैसदक़ा-ए-फ़ातिमा, हसनैन-ओ-'अली कर दे, कि हैतू है मुख़्तार, प-ए-ग़ौस-ए-जली कर दे, कि हैमेरी तक़्दीर बुरी हो तो भली कर दे, कि हैमहव-ओ-इस्बात के दफ़्तर पे कड़ोड़ा तेरा

दौलत-ए-'इश्क़ से दिल मेरा ग़नी कर दे, कि हैगुम रहूँ तुझ में, मेरी ख़त्म ख़ुदी कर दे, कि हैमुझ गुनहगार पे रहमत की झड़ी कर दे, कि हैमेरी तक़्दीर बुरी हो तो भली कर दे, कि हैमहव-ओ-इस्बात के दफ़्तर पे कड़ोड़ा तेरा

हैं जो बे-ज़र, मेरी सरकार ! उन्हें ज़र दे, कि हैंबेटियाँ जिन की कुँवारी हैं, उन्हें बर दे, कि हैछत नहीं जिन को मयस्सर, उन्हें इक घर दे, कि हैमेरी तक़्दीर बुरी हो तो भली कर दे, कि हैमहव-ओ-इस्बात के दफ़्तर पे कड़ोड़ा तेरा

का'बा-ए-जाँ का मिले हश्र में जब मुझ को ग़िलाफ़साथ माँ-बाप हों,अहबाब भी हों और अख़्लाफ़इस 'इनायत पे यही शोर उठे चौ-अतराफ़चोर हाकिम से छुपा करते हैं याँ इस के ख़िलाफ़तेरे दामन में छुपे चोर अनोखा तेरा

मेरे 'ईसा ! तेरे बीमार पे कैसी गुज़रेबे-नवा ज़ार पे, लाचार पे कैसी गुज़रेनज़'अ के वक़्त गुनहगार पे कैसी गुज़रेदूर क्या जानिए बदकार पे कैसी गुज़रेतेरे ही दर पे मरे बे-कस-ओ-तन्हा तेरा

वाह ! क्या शान बढ़ाई है ख़ुदा ने तेरीअव्वलीं-आख़रीं सब हम्द करेंगे तेरीदौड़े सब जाम-ब-कफ़, बटने लगे मय तेरीतेरे सदक़े मुझे इक बूँद बहुत है तेरीजिस दिन अच्छों को मिले जाम छलक्ता तेरा

गर तलब है कि बर आएँ तेरी हाजात-ए-जमी'अकर, 'उबैद ! अपने रज़ा की ज़रा तक़्लीद-ए-वकी'अपेश कर तू भी यही क़ौल ब-दरगाह-ए-वक़ी'अतेरी सरकार में लाता है रज़ा उस को शफ़ी'अजो मेरा ग़ौस है और लाडला बेटा तेरा

कलाम:इमाम अहमद रज़ा ख़ान

तज़मीन:ओवैस रज़ा क़ादरी (उबैद रज़ा)

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