क़ुर्बान मैं उन की बख़्शिश के मक़्सद भी ज़बाँ पर आया नहींबिन माँगे दिया और इतना दिया, दामन में हमारे समाया नहीं
ईमान मिला उन के सदक़े, क़ुरआ'न मिला उन के सदक़ेरहमान मिला उन के सदक़े, वो क्या है जो हमने पाया नहीं
उन का तो शिआ'र करीमी है, माइल-ब-करम ही रहते हैंजब याद किया ए सल्ले अला ! वो आ ही गए तड़पाया नहीं
जो दुश्मन-ए-जाँ थे उन को भी दी तुमने अमाँ अपनों की तरहये अफ़्व-ओ-करम ! अल्लाह अल्लाह ! ये ख़ुल्क़ किसी ने पाया नहीं
वो रहमत कैसी रहमत है ! मफ़्हूम समझ लो रहमत काउस को भी गले से लगाया है जिसे अपना किसी ने बनाया नहीं
रहमत का भरम भी तुम से है, शफ़क़त का भरम भी तुम से हैठुकराए हुए इंसान को भी तुम ने तो कभी ठुकराया नहीं
दिल भर गए मँगतों के लेकिन देने से तेरी निय्यत न भरीजो आया उसे भर भर के दिया, महरूम कभी लौटाया नहीं
ख़ुर्शीद-ए-क़यामत की ताबिश माना के क़यामत ही होगीहम उन के हैं घबराएँ क्यूँ ! क्या हम पे नबी का साया नहीं !
उन मोहसिन-ए-आज़म के यूँ तो ख़ालिद पे हज़ारों एहसाँ हैंक़ुर्बान मगर उस एहसाँ के एहसाँ भी किया तो जताया नहीं
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