मुझ को दर-पेश है फिर मुबारक सफ़रक़ाफ़िला फिर मदीने का तय्यार हैनेकियों का नहीं कोई तोशा, फ़क़तहाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
कोई सज्दों की सौग़ात है न कोईज़ोह्द-ओ-तक़्वा मेरे पास, सरकार ! हैचल पड़ा हूँ मदीने की जानिब मगरहाए ! सर पर गुनाहों का अम्बार है
जुर्म-ओ-इस्याँ पे अपने लजाता हुआऔर अश्क-ए-नदामत बहाता हुआतेरी रहमत पे नज़रें जमाता हुआदर पे हाज़िर ये तेरा गुनहगार है
तेरा सानी कहाँ ! शाह-ए-कौन-ओ-मकाँमुझ सा आसी भी उम्मत में होगा कहाँ !तेरे अफ़्व-ओ-करम का शह-ए-दो-जहाँ !क्या कोई मुझ से बढ़ कर भी हक़दार है ?
मुजरिमों को, शहा ! बख़्शवाता है तूअपनी उम्मत की बिगड़ी बनाता है तूग़म के मारों को सीने लगाता है तूग़म-ज़दों, बे-कसों का तू ग़म-ख़्वार है
ठोकरें दर-ब-दर कब तलक खाऊँ मैंफिर मदीने मुक़द्दर से जब आऊँ मैंकाश ! क़दमों में, सरकार ! मर जाऊँ मैंया नबी ! ये तमन्ना-ए-अत्तार है
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