नात लिरिक्स

Muhammad Mazhar-e-Kamil Hai Haq Ki Shaan-e-Izzat Ka

मुहम्मद मज़्हर-ए-कामिल है हक़ की शान-ए-इज़्ज़त का

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: इमाम अहमद रज़ा ख़ानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मुहम्मद मज़्हर-ए-कामिल है हक़ की शान-ए-'इज़्ज़त कानज़र आता है इस कसरत में कुछ अंदाज़ वहदत का

यही है अस्ल-ए-'आलम माद्दा-ए-ईजाद-ए-ख़ल्क़त कायहाँ वहदत में बरपा है 'अजब हंगामा कसरत का

गदा भी मुन्तज़िर है ख़ुल्द में नेकों की दा'वत काख़ुदा दिन ख़ैर से लाए सख़ी के घर ज़ियाफ़त का

गुनह मग़्फ़ूर, दिल रौशन, ख़ुनुक आँखें, जिगर ठंडात'आलल्लाह माह-ए-तयबा ! 'आलम तेरी तल'अत का

न रक्खी गुल के जोश-ए-हुस्न ने गुलशन में जा बाक़ीचटक्ता फिर कहाँ ग़ुंचा कोई बाग़-ए-रिसालत का

बढ़ा ये सिलसिला रहमत का दौर-ए-ज़ुल्फ़-ए-वाला मेंतसलसुल काले-कोसों रह गया 'इस्याँ की ज़ुल्मत का

सफ़-ए-मातम उठे, ख़ाली हो ज़िंदाँ, टूटें ज़ंजीरेंगुनहगारो ! चलो मौला ने दर खोला है जन्नत का

सिखाया है ये किस गुस्ताख़ ने आईने को, या रब !नज़ारा रू-ए-जानाँ का बहाना कर के हैरत का

इधर उम्मत की हसरत पर, उधर ख़ालिक़ की रहमत परनिराला तौर होगा गर्दिश-ए-चश्म-ए-शफ़ा'अत का

बढ़ीं इस दर्जा मौजें कसरत-ए-अफ़ज़ाल-ए-वाला कीकिनारा मिल गया इस नहर से दरिया-ए-वहदत का

ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-नबी साजिद है मेहराब-दो-अब्रू मेंकि या रब ! तू ही वाली है सियह-कारान-ए-उम्मत का

मदद, ऐ जोशिश-ए-गिर्या ! बहा दे कोह और सहरानज़र आ जाए जल्वा बे-हिजाब उस पाक तुर्बत का

हुए कम-ख़्वाबी-ए-हिज्राँ में सातों पर्दे कम-ख़्वाबीतसव्वुर ख़ूब बाँधा आँखों ने अस्तार-ए-तुर्बत का

यक़ीं है वक़्त-ए-जल्वा लग़्ज़िशें पा-ए-निगह पाएमिले जोश-ए-सफ़ा-ए-जिस्म से पा-बोस हज़रत का

यहाँ छिड़का नमक वाँ मरहम-ए-काफ़ूर हाथ आयादिल-ए-ज़ख़्मी नमक-पर्वर्दा है किस की मलाहत का

इलाही ! मुन्तज़िर हूँ वो ख़िराम-ए-नाज़ फ़रमाएँबिछा रक्खा है फ़र्श आँखों ने कम-ख़्वाब-ए-बसारत का

न हो आक़ा को सज्दा, आदम-ओ-यूसुफ़ को सज्दा होमगर सद्द-ए-ज़राए'-दाब है अपनी शरी'अत का

ज़बान-ए-ख़ार किस किस दर्द से उन को सुनाती हैतड़पना दश्त-ए-तयबा में जिगर अफ़्गार फ़ुर्क़त का

सिरहाने उन के बिस्मिल के ये बेताबी का मातम हैशह-ए-कौसर ! तरह्हुम तिश्ना जाता है ज़ियारत का

जिन्हें मरक़द में ता-हश्र उम्मती कह कर पुकारोगेहमें भी याद कर लो उन में सदक़ा अपनी रहमत का

वो चमकें बिजलियाँ, या रब ! तजल्लीहा-ए-जानाँ सेकि चश्म-ए-तूर का सुरमा हो, दिल मुश्ताक़ रूयत का

रज़ा-ए-ख़स्ता ! जोश-ए-बहर-ए-'इस्याँ से न घबरानाकभी तो हाथ आ जाएगा दामन उन की रहमत का

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।