मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीनारौज़े पे बुला लीजिए, सुल्तान-ए-मदीना !
ए काश ! पहुँच के दर-ए-जानान-ए-मदीनाहो जाऊँ मैं सो जान से क़ुर्बान-ए-मदीना
मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीनाआते हैं मुक़द्दर के सिकंदर तेरे दर परबे-इज़्न हो कैसे कोई मेहमान-ए-मदीना !
मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीना
आग ऐसी लगा दीजिए क़ल्ब और जिगर मेंरोता रहूँ, तड़पा करूँ, ए जान-ए-मदीना !
मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीना
अब सिंध के जंगल में मेरा जी नहीं लगताबस मुझ को बुला लीजे गुलिस्तान-ए-मदीना
मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीना
कर दीजिए दीदार से आँखें मेरी ठंडीए जान-ए-जहाँ ! सय्यिद-ओ-सुल्तान-ए-मदीना
मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीना
क़दमों में बुला लीजिए बद-कार को, आक़ा !और इस को बना लीजिए मेहमान-ए-मदीना
मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीना
अत्तार को दौलत न हुक़ूमत की तलब हैदे दीजे बक़ीअ' इस को तो सुल्तान-ए-मदीना
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