नात लिरिक्स

Meri Ulfat Madine Se Yun Hi Nahin Mere Aaqa Ka Rauza Madine Mein Hai

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में है

नात ख़्वान: अल्लामा हाफ़िज़ बिलाल क़ादरीशायर: मुनीर क़सूरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं, मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में हैमैं मदीने की जानिब न कैसे खिंचूँ, मेरा दीन और दुनिया मदीने में है

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं, मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में है

'अर्श-ए-आ'ज़म से जिस की बड़ी शान है, रौज़ा-ए-मुस्तफ़ा जिस की पहचान हैजिस का हम-पल्ला कोई मुहल्ला नहीं, एक ऐसा मुहल्ला मदीने में है

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं, मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में है

फिर मुझे मौत का कोई ख़तरा न हो, मौत क्या ज़िंदगी की भी परवा न होकाश ! सरकार इक बार मुझ से कहें, अब तेरा जीना-मरना मदीने में है

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं, मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में है

सरवर-ए-दो-जहाँ से दु'आ है मेरी, हाँ ! ब-दो-चश्म-ए-तर इल्तिजा है मेरीउन की फ़ेहरिस्त में मेरा भी नाम हो, जिन का रोज़ आना-जाना मदीने में है

मेरी उल्फ़त मदीने से यूँ ही नहीं, मेरे आक़ा का रौज़ा मदीने में है

जब नज़र सू-ए-तयबा रवाना हुई, साथ दिल भी गया, साथ जाँ भी गईमैं, मुनीर ! अब रहूँगा यहाँ किस लिए ? मेरा सारा असासा मदीने में है

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