नात लिरिक्स

Marhaba Ya Mustafa | Naseeb Chamke Hain Farshiyon Ke Ki Arsh Ke Chand Aa Rahe Hain

मरहबा या मुस्तफ़ा | नसीब चमके हैं फ़र्शियों के कि अर्श के चाँद आ रहे हैं

नात ख़्वान: मीलाद रज़ा क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

नसीब चमके हैं फ़र्शियों के, कि 'अर्श के चाँद आ रहे हैंझलक से जिन की फ़लक है रौशन, वो शम्स तशरीफ़ ला रहे हैं

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

निसार तेरी चहल-पहल पे हज़ारों 'ईदें रबी-'उल-अव्वलसिवाए इब्लिस के जहाँ में सभी तो ख़ुशियाँ मना रहे हैं

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

शब-ए-विलादत में सब मुसलमाँ, न क्यूँ करें जान-ओ-माल क़ुर्बां !अबू लहब जैसे सख़्त क़ाफ़िर ख़ुशी में जब फ़ैज़ पा रहे हैं

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

ज़माने भर में ये क़ा'इदा है कि जिस का खाना उसी का गानातो ने'मतें जिन की खा रहे हैं, उन्हीं के हम गीत गा रहे हैं

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

जो क़ब्र में उन को अपनी पाऊँ, पकड़ के दामन मचल ही जाऊँजो दिल में रह के छुपे थे मुझ से, वो आज जल्वा दिखा रहे हैं

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

मैं तेरे सदक़े, ज़मीन-ए-तयबा ! फ़िदा न हो तुझ पे क्यूँ ज़मानाकि जिन की ख़ातिर बने ज़माने, वो तुझ में आराम पा रहे हैं

मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !मरहबा या मुस्तफ़ा ! मरहबा या मुस्तफ़ा !

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