नात लिरिक्स

Marhaba Marhaba Mah-e-Ramzan | Wah Kya Baat Mah-e-Ramzan Ki

मरहबा मरहबा मह-ए-रमज़ाँ | वाह क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

नात ख़्वान: मेहमूद अत्तारीशायर: मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मरहबा मरहबा ! मह-ए-रमज़ाँ !वाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ कीआने वाला है अब मह-ए-ग़ुफ़राँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

माह-ए-रमज़ाँ में उतरा है क़ुरआँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ कीये है ग्यारह महीनों का सुल्ताँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

ले लो फ़ज़्ल-ओ-करम की सौग़ातेंमग़्फ़िरत की बटेंगी ख़ैरातें'आसियो ! आओ, भर लो तुम दामाँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

ख़ूब बरसात रहमतों की हैऔर 'अताओं की, बख़्शिशों की हैजाना जन्नत में हो गया आसाँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

हर तरफ़ नूर छाने वाला हैमरहबा ! चार-सू उजाला हैग़म-ज़दा दिल की खिल उठी कलियाँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

बंदगी दिल लगा के तुम करनारब की रहमत से झोलियाँ भरनाहै फ़क़त एक माह का मेहमाँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

दूर शैतान की नुहूसत होनफ़्स के शर से भी हिफ़ाज़त होकाश ! पढ़ता रहूँ सदा क़ुरआँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

प्यारे प्यारे नबी की बरकत हैदिल में रमज़ान की मोहब्बत हैइस पे दे इस्तिक़ामत, ऐ सुब्हाँ !वाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

माह-ए-रमज़ाँ का वासिता, या रब !तुझ को क़ुरआँ का वासिता, या रब !कर दे मेरी तू मग़्फ़िरत, रहमाँ !वाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

पहली रमज़ाँ को मेरे ग़ौस आएसाथ अपने करामतें लाएरखा हर रोज़ रोज़ा-ए-रमज़ाँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

या ख़ुदा ! अज़ प-ए-शह-ए-जीलाँदे दे 'अत्तार को ग़म-ए-रमज़ाँये बने काश ! 'आशिक़-ए-रमज़ाँवाह ! क्या बात माह-ए-रमज़ाँ की

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।