नात लिरिक्स

Lahad Mein Ishq-e-Rukh-e-Shah Ka Daag Le Ke Chale

लहद में इश्क़-ए-रुख़-ए-शह का दाग़ ले के चले

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: इमाम अहमद रज़ा ख़ानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

लहद में 'इश्क़-ए-रुख़-ए-शह का दाग़ ले के चलेअँधेरी रात सुनी थी चराग़ ले के चले

तेरे ग़ुलामों का नक़्श-ए-क़दम है राह-ए-ख़ुदावो क्या बहक सके जो ये सुराग़ ले के चले

जिनाँ बनेगी मुहिब्बान-ए-चार-यार की क़ब्रजो अपने सीने में ये चार बाग़ ले के चले

गए, ज़ियारत-ए-दर की, सद आह ! वापस आएनज़र के अश्क पुछे दिल का दाग़ ले के चले

मदीना जान-ए-जिनान-ओ-जहाँ है वो सुन लेंजिन्हें जुनून-ए-जिनाँ सू-ए-ज़ाग़ ले के चले

तेरे सहाब-ए-सुख़न से न नम कि नम से भी कमबलीग़ बहर-ए-बलाग़त बलाग़ ले के चले

हुज़ूर-ए-तयबा से भी कोई काम बढ़ कर हैकि झूटे हीला-ओ-मक्र-ओ-फ़राग़ ले के चले

तुम्हारे वस्फ़-ए-जमाल-ओ-कमाल में जिब्रीलमुहाल है कि मजाल-ओ-मसाग़ ले के चले

गिला नहीं है मुरीद-ए-रशीद-ए-शैताँ सेकि उस के वुस'अत-ए-'इल्मी का लाग़ ले के चले

हर एक अपने बड़े की बड़ाई करता हैहर एक मुग़बचा मुग़ का अयाग़ ले के चले

मगर ख़ुदा पे जो धब्बा दरोग़ का थोपाये किस ल'ईं की ग़ुलामी का दाग़ ले के चले

वुक़ू'-ए-किज़्ब के मा'नी दुरुस्त और क़ुद्दूसहिये की फूटे 'अजब सब्ज़ बाग़ ले के चले

जहाँ में कोई भी काफ़िर सा काफ़िर ऐसा हैकि अपने रब पे सफ़ाहत का दाग़ ले के चले

पड़ी है अँधे को 'आदत कि शोरबे ही से खाएबटेर हाथ न आई तो ज़ाग़ ले के चले

ख़बीस बहर-ए-ख़बीसा ख़बीसा बहर-ए-ख़बीसकि साथ जिन्स को बाज़-ओ-कुलाग़ ले के चले

जो दीन कव्वों को दे बैठे उन को यक्साँ हैकुलाग़ ले के चले या उलाग़ ले के चले

रज़ा ! किसी सग-ए-तयबा के पाँव भी चूमे ?तुम और आह कि इतना दिमाग़ ले के चले

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