नात लिरिक्स

Khaak-e-Madina Hoti, Main Khaaksaar Hota

ख़ाक-ए-मदीना होती, मैं ख़ाकसार होता

नात ख़्वान: क़ारी ख़लील अत्तारीशायर: मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

ख़ाक-ए-मदीना होती, मैं ख़ाकसार होताहोती रह-ए-मदीना मेरा ग़ुबार होता

आक़ा अगर करम से तयबा मुझे बुलातेरौज़े पर सदक़े होता, उन पर निसार होता

वो बेकसों के आक़ा, बेकस को गर बुलातेक्यूँ सब की ठोकरों पर पड़ कर वो ख़्वार होता

तयबा में गर मुयस्सर दो-गज़ ज़मीन होतीउन के क़रीब बसता, दिल को क़रार होता

मर मिट के ख़ूब लगती मिट्टी मेरी ठिकानेगर उन की रह-गुज़र पर मेरा मज़ार होता

ये आरज़ू है दिल की होता वो सब्ज़-गुम्बदऔर मैं ग़ुबार बन कर उस पर निसार होता

बे-चैन दिल को अब तक समझा बुझा के रखामगर अब तो इस से, आक़ा ! नहीं इंतिज़ार होता

सालिक ! हुए हम उन के, वो भी हुए हमारेदिल-ए-मुज़्तरिब को लेकिन नहीं ए'तिबार होता

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