नात लिरिक्स

Jo Bhi Nabi Ke Ishq Ke Sanche Mein Dhal Gaya

जो भी नबी के इश्क़ के साँचे में ढल गया

नात ख़्वान: सज्जाद निज़ामीशायर: सज्जाद निज़ामीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

जो भी नबी के 'इश्क़ के साँचे में ढल गयाउस का क़सम ख़ुदा की मुक़द्दर बदल गया

मेरे रसूल-ए-पाक के क़दमों को चूम करपत्थर ज़मीं पे मोम की सूरत पिघल गया

जन्नत में उस को देख के हूरें मचल गईंचेहरे पे अपने ख़ाक-ए-मदीना जो मल गया

मुश्किल में पड़ गई हैं मेरी मुश्किलें सभीमुश्किल-कुशा का नाम जो मुँह से निकल गया

दहलीज़-ए-मुस्तफ़ा पे झुका जब किसी का सरपरवाज़ की हदों से वो आगे निकल गया

बेचैन जब किया मुझे याद-ए-रसूल नेपढ़ते ही ना'त-ए-पाक मेरा दिल बहल गया

ख़्वाजा पिया की चश्म-ए-'इनायत तो देखिएमुझ जैसा खोटा-सिक्का ज़माने में चल गया

मैं ने तो सिर्फ़ मस्लक-ए-अहमद-रज़ा कहासुन कर वहाबियत का जनाज़ा निकल गया

सज्जाद की ज़बान से ना'त-ए-रसूल कोसुन कर नबी का चाहने वाला मचल गया

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