नात लिरिक्स

Ilahi Roza-e-Khair-ul-Bashar Par Main Agar Jaun

इलाही रौज़ा-ए-ख़ैर-उल-बशर पे मैं अगर जाऊँ

नात ख़्वान: ओवैस रज़ा क़ादरीशायर: मुफ़्ती मुहम्मद ख़लील खाँ ख़लील बरकातीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

इलाही ! रौज़ा-ए-ख़ैर-उल-बशर पे मैं अगर जाऊँतो इक सज्दा करूँ ऐसा कि आपे से गुज़र जाऊँ

नजात-ए-आख़िरत का इस-क़दर सामान कर जाऊँकि तयबा जा के इक सज्दा करूँ, सज्दे में मर जाऊँ

मदीने जाने वाले सर के बल जाते हैं जाने दोमेरी क़िस्मत में हो जाना तो बा-रंग-ए-दिगर जाऊँ

उड़ा दूँ सब से पहले ताइर-ए-जाँ उस तरफ़ अपनासहारे से उसी ताइर के फिर बे-बाल-ओ-पर जाऊँ

कभी रौज़े से मिम्बर तक, कभी मिम्बर से रौज़े तकइधर जाऊँ, उधर जाऊँ, इसी हालत में मर जाऊँ

सगान-ए-कूचा-ए-दिलदार की पैहम बलाएँ लूँतमाशा बन के रह जाऊँ, मदीने में जिधर जाऊँ

सगान-ए-कूचा-ए-जानाँ की मैं पैहम बलाएँ लूँतमाशा बन के रह जाऊँ, मदीने में जिधर जाऊँ

मैं कुछ दुर्र-ए-शफ़ा'अत ले के लौटूँ चश्म-ए-रहमत केजो दरबार-ए-म'आली में कभी बा-चश्म-ए-तर जाऊँ

तुम्हारे नाम-लेवा बे-ख़तर जाते हैं महशर मेंइशारा हो अगर मुझ को तो मैं भी बे-ख़तर जाऊँ

तवज़्ज़ोह उन करम-परवर निगाहों की जो हो जाएमेरा ईमाँ सँवर जाए, मैं ईमाँ से सँवर जाऊँ

ख़लील ! अब ज़ाद-ए-राह-ए-आख़िरत की स'ई-ए-अहसन मेंमदीने सर के बल जाऊँ, वहाँ पहुँचूँ तो मर जाऊँ

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