नात लिरिक्स

Hawa Ki Khushboo Bata Rahi Hai Wo Zulf Apni Saja Rahe Hain

हवा की ख़ुश्बू बता रही है वो ज़ुल्फ़ अपनी सजा रहे हैं

नात ख़्वान: शाहबाज़ क़मर फ़रीदीशायर: अब्दुल सत्तार नियाज़ीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

हवा की ख़ुश्बू बता रही है, वो ज़ुल्फ़ अपनी सजा रहे हैंसवारी तयबा से चल पड़ी है, हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे हैं

नवाज़िशों पर नवाज़िशें हैं, 'इनायतों पर 'इनायतें हैंनबी की ना'तें सुना सुना कर हम अपनी क़िस्मत जगा रहे हैं

कहीं पे रौनक़ है मय-कशों की, कहीं पे महफ़िल है दिल-जलों कीये कितने ख़ुश-बख़्त हैं जो अपने नबी की महफ़िल सजा रहे हैं

न पास पी हो तो सूना सावन, वो जिस पे राज़ी वही सुहागनजिन्हों ने पकड़ा नबी का दामन, उन्हीं के घर जगमगा रहे हैं

यहाँ पे लाखों सिकंदर आए, न बाँस बाक़ी न बाँसुरी हैमगर हमारे नबी के झंडे अज़ल के दिन से खड़े हुए हैं

कोई तो बोले जिसे ख़ुदा ने नहीं दिया है नबी का सदक़ाहमारे बच्चे तो मुस्तफ़ा के ही टुकड़े खा कर बड़े हुए हैं

हबीब-ए-दावर, ग़रीब-परवर, रसूल-ए-अकरम, करम के पैकरकिसी को दर पे बुला रहे हैं, किसी के ख़्वाबों में आ रहे हैं

मैं अपने ख़ैर-उल-वरा के सदक़े, मैं उन की शान-ए-'अता के सदक़ेभरा है 'ऐबों से मेरा दामन, हुज़ूर फिर भी निभा रहे हैं

बनेगा जाने का फिर बहाना, कहेगा आ कर कोई दीवानाचलो, नियाज़ी ! तुम्हें मदीने, मदीने वाले बुला रहे हैं

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