नात लिरिक्स

Har Ek Sans Salle Ala Padh Rahi Hai

हर इक साँस सल्ले-अला पढ़ रही है

नात ख़्वान: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वीशायर: सय्यिद शाह गुलज़ार इस्माइल वास्ती क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

हर इक साँस सल्ले-'अला पढ़ रही है, मैं नाम-ए-मुहम्मद लिए जा रहा हूँमुझे मौत आए दर-ए-मुस्तफ़ा पर, इसी आरज़ू में जिए जा रहा हूँ

मुझे मिल गई है शराब-ए-मोहब्बत, किसी जाम की अब नहीं है ज़रूरतपिया ग़ौस-ए-आ'ज़म से अहमद रज़ा ने, मैं अहमद रज़ा से पिए जा रहा हूँ

ये जो मस्लक-ए-आ'ला हज़रत है, लल्ला ! यही दीन-ए-हक़ की है पहचान वल्लाहजो इस से कटा वो हमारा नहीं है, ये पैग़ाम हर-सू दिए जा रहा हूँ

ज़माने में कुछ भी नहीं इस से बढ़ कर, कि हिस्से में आई मेरे ना'त-ए-सरवरवो नज़र-ए-'इनायत किए जा रहे हैं, मैं गुलज़ार ! मिदहत किए जा रहा हूँ

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।