नात लिरिक्स

Ghulam-e-Shah-e-Batha Hun Tu Mujh Ko Kya Samajhta Hai

ग़ुलाम-ए-शाह-ए-बतहा हूँ तू मुझ को क्या समझता है

नात ख़्वान: मुहम्मद अली फ़ैज़ीशायर: सय्यिद शबाहत हुसैनउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

ग़ुलाम-ए-शाह-ए-बतहा हूँ, तू मुझ को क्या समझता हैदर-ए-ख़्वाजा का मँगता हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

कहा शब्बीर ने ललकार के, शिम्र-ए-ल'ईं सुन ले'अली हैदर का बेटा हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

वो जिस ने फाड़ डाला शेर को बग़दाद के अंदरउसी कुत्ते का कुत्ता हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

मैं हूँ ग़ौस-उल-वरा और साबिर-ए-कलियर का मस्तानाकिछौछा पे मैं मरता हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

मुजद्दिद ने कहा, अकबर ! चढ़ा दे मुझ को सूली परनहीं तुझ से मैं डरता हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

लगा ले ज़ोर चाहे, हिन्द से मैं जा नहीं सकतामैं ख़्वाजा का बसाया हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

है निस्बत सय्यिद-ए-सालार से, वारिस से उल्फ़त हैमगर रज़वी मैं पक्का हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

मैं बचपन से हूँ दीवाना शह-ए-अहमद रज़ा ख़ाँ काबरेली का मैं शैदा हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

मेरे अख़्तर रज़ा सरकार मेरे दिल की धड़कन हैंमैं उन पर जान देता हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

है ख़ून-ए-क़ादरी मुझ में, शबाहत मुझ को कहते हैंअसीर अख़्तर रज़ा का हूँ, तू मुझ को क्या समझता है

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