नात लिरिक्स

Dilon Ke Gulshan Mehak Rahe Hain Ye Kaif Kyun Aaj Aa Rahe Hain

दिलों के गुलशन महक रहे हैं ये कैफ़ क्यूँ आज आ रहे हैं

नात ख़्वान: सय्यिद फ़सीहुद्दीन सोहरवर्दीशायर: मौलाना अब्दुल सत्तार नियाज़ीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

दिलों के गुलशन महक रहे हैं, ये कैफ़ क्यूँ आज आ रहे हैंकुछ ऐसा महसूस हो रहा है, हुज़ूर तशरीफ़ ला रहे हैं

नवाज़िशों पर नवाज़िशें हैं, 'इनायतों पर 'इनायतें हैंनबी की ना'तें सुना सुना कर हम अपनी क़िस्मत जगा रहे हैं

कहीं पे रौनक़ है मय-कशों की, कहीं पे महफ़िल है दिल-जलों कीये कितने ख़ुश-बख़्त हैं जो अपने नबी की महफ़िल सजा रहे हैं

न पास पी हो तो सूना सावन, वो जिस पे राज़ी वही सुहागनजिन्हों ने पकड़ा नबी का दामन, उन्हीं के घर जगमगा रहे हैं

कहाँ का मंसब, कहाँ की दौलत, क़सम ख़ुदा की ! ये है हक़ीक़तजिन्हें बुलाया है मुस्तफ़ा ने वही मदीने को जा रहे हैं

हबीब-ए-दावर, ग़रीब-परवर, रसूल-ए-अकरम, करम के पैकरकिसी को दर पे बुला रहे हैं, किसी के ख़्वाबों में आ रहे हैं

मैं अपने ख़ैर-उल-वरा के सदक़े, मैं उन की शान-ए-'अता के सदक़ेभरा है 'ऐबों से मेरा दामन, हुज़ूर फिर भी निभा रहे हैं

गदा की औक़ात है ही कितनी, हक़ीक़तन है ये बात इतनीख़ुदा है देता नबी का सदक़ा, नबी का सदक़ा ही खा रहे हैं

जहाँ पे मैं अब खड़ा हुआ हूँ, ये ज़िक्र-ए-सरवर की बरकतें हैंमैं उन का मुश्ताक़ हूँ अज़ल से, जो सब की बिगड़ी बना रहे हैं

बनेगा जाने का फिर बहाना, कहेगा आ कर कोई दीवानाचलो, नियाज़ी ! तुम्हें मदीने, मदीने वाले बुला रहे हैं

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।