नात लिरिक्स

Dar-e-Nabi Par Ye Umr Beete | Ye Rifat-e-Zikr-e-Mustafa Hai

दर-ए-नबी पर ये उम्र बीते | ये रिफ़अत-ए-ज़िक्र-ए-मुस्तफ़ा है

नात ख़्वान: यूसुफ़ मेमनशायर: ख़ालिद मेहमूद नक़्शबन्दीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

दर-ए-नबी पर ये 'उम्र बीते, हो हम पे लुत्फ़-ए-दवाम ऐसामदीने वाले कहें मक़ामी हो उन के दर पर क़याम ऐसा

ये रिफ़'अत-ए-ज़िक्र-ए-मुस्तफ़ा है, नहीं किसी का मक़ाम ऐसाजो बा'द ज़िक्र-ए-ख़ुदा है अफ़ज़ल, है ज़िक्र-ए-ख़ैर-उल-अनाम ऐसा

जो ग़म-ज़दों को गले लगा ले, बुरों को दामन में जो छुपा लेहै दूसरा कौन इस जहाँ में सिवा-ए-ख़ैर-उल-अनाम ऐसा

बिलाल तुझ पर निसार जाऊँ कि ख़ुद नबी ने तुझे ख़रीदानसीब हो तो नसीब ऐसा, ग़ुलाम हो तो ग़ुलाम ऐसा

नमाज़ अक़्सा में जब पढ़ाई तो अंबिया और रुसुल ये बोलेनमाज़ हो तो नमाज़ ऐसी, इमाम हो तो इमाम ऐसा

लबों पे नाम-ए-नबी जब आया, गुरेज़-पा हादिसों को पायाजो टाल देता है मुश्किलों को, मेरे नबी का है नाम ऐसा

मुझ ही को देखो वो बे-तलब ही नवाज़ते जा रहे हैं पैहमन कोई मेरा 'अमल है ऐसा, न कोई मेरा है काम ऐसा

हुसैन क़ुरआँ के हैं वो क़ारी, जो नोक-ए-नेज़ा पे भी ये बोलेसिवा ख़ुदा के न सर झुकाना, दिया जहाँ को पयाम ऐसा

हैं जितने 'अक़्ल-ओ-ख़िरद के दा'वे, सब उन की गर्द-ए-सफ़र में गुम हैंकोई भी अब तक समझ न पाया, है मुस्तफ़ा का मक़ाम ऐसा

मैं, ख़ालिद ! अपने नबी पे क़ुर्बां, है जिन का ख़ुल्क़-ए-'अज़ीम क़ुरआँहै रौशनी जिस की दो जहाँ में, कहीं है माह-ए-तमाम ऐसा

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।