नात लिरिक्स

Bhar Do Jholi Meri Ya Muhammad Laut Kar Main Na Jaunga Khali | Bhar Do Jholi Meri Jaan-e-Aalam

भर दो झोली मेरी या मुहम्मद लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली | भर दो झोली मेरी जान-ए-आलम

नात ख़्वान: साबरी ब्रदर्सशायर: पुरनम इलाहाबादीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ालीकुछ नवासों का सदक़ा 'अता होदर पे आया हूँ बन कर सवाली

तुम ज़माने के मुख़्तार हो, या नबी !बेकसों के मददगार हो, या नबी !सब की सुनते हो अपने हों या ग़ैर होंतुम ग़रीबों के ग़म-ख़्वार हो, या नबी !

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

हम हैं रंज-ओ-मुसीबत के मारे हुएसख़्त मुश्किल है, ग़म से हैं हारे हुएया नबी ! कुछ ख़ुदा-रा हमें भीक दोदर पे आए हैं दामन पसारे हुए

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

तुम्हारे आस्ताने से ज़माना क्या नहीं पाताकोई भी दर से ख़ाली माँगने वाला नहीं जाता

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

हक़ से पाई वो शान-ए-करीमीमरहबा दोनों-'आलम के वाली !उस की क़िस्मत का चमका सिताराजिस पे नज़र-ए-करम तुम ने डाली

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

ज़िंदगी बख़्श दी बंदगी कोआबरू दीन-ए-हक़ की बचा लीवो मुहम्मद का प्यारा नवासाजिस ने सज्दे में गर्दन कटा ली

जो इब्न-ए-मुर्तज़ा ने किया काम ख़ूब हैक़ुर्बानी-ए-हुसैन का अंजाम ख़ूब हैक़ुर्बान हो के फ़ातिमा ज़हरा के चैन नेदीन-ए-ख़ुदा की शान बढ़ाई हुसैन नेबख़्शी है जिस ने मज़हब-ए-इस्लाम को हयातकितनी 'अज़ीम हज़रत-ए-शब्बीर की है ज़ातमैदान-ए-कर्बला में शह-ए-ख़ुश-ख़िसाल नेसज्दे में सर कटा के मुहम्मद के ला'ल ने

ज़िंदगी बख़्श दी बंदगी कोआबरू दीन-ए-हक़ की बचा लीमेरे आक़ा का प्यारा नवासाजिस ने सज्दे में गर्दन कटा ली

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

हश्र में उन को देखेंगे जिस दमउम्मती ये कहेंगे ख़ुशी सेआ रहे हैं वो देखो मुहम्मदजिन की है शान सब से निराली

हर नज़र काँप उट्ठेगी महशर के दिनख़ौफ़ से हर कलेजा दहल जाएगामुस्कुराते हुए आप आ जाएँगेहश्र का सारा नक़्शा बदल जाएगा

आ रहे हैं वो देखो मुहम्मदजिन की है शान सब से निराली

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

'आशिक़-ए-मुस्तफ़ा की अज़ाँ मेंअल्लाह अल्लाह कितना असर था'अर्श वाले भी सुनते थे जिस कोक्या अज़ाँ थी अज़ान-ए-बिलाली !

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

है मुख़ालिफ़ ज़माना किधर जाएँ हमहालत-ए-बेकसी किस को दिखलाएँ हमहम तुम्हारे भिकारी हैं, या मुस्तफ़ा !किस के आगे भला हाथ फैलाएँ हम

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

काश पुरनम ! दयार-ए-नबी मेंजीते-जी हो बुलावा किसी दिनहाल-ए-दिल मुस्तफ़ा को सुनाऊँथाम कर उन के रौज़े की जाली

भर दो झोली मेरी, जान-ए-'आलम !लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ालीकुछ नवासों का सदक़ा 'अता होदर पे आया हूँ बन कर सवाली

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