नात लिरिक्स

Azal Se Hath Mein Daman Hai Aaya Ghaus-e-Azam Ka | Khuda Ke Fazl Se Hum Par With Tazmeen

अज़ल से हाथ में दामन है आया ग़ौस-ए-आज़म का | ख़ुदा के फ़ज़्ल से हम पर तज़मीन के साथ

नात ख़्वान: राओ ब्रदर्सउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

इमदाद कुन, इमदाद कुन, अज़ रंज-ओ-ग़म आज़ाद कुनदर दीन-ओ-दुनिया शाद कुन, या ग़ौस-ए-आ'ज़म दस्त-गीर !

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

अज़ल से हाथ में दामन है आया ग़ौस-ए-आ'ज़म काकरम से सिलसिला हम ने है पाया ग़ौस-ए-आ'ज़म का'अदम से रब ने शैदाई बनाया ग़ौस-ए-आ'ज़म काख़ुदा के फ़ज़्ल से हम पर है साया ग़ौस-ए-आ'ज़म काहमें दोनों जहाँ में है सहारा ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

बनी किस के सबब हर बात है ! बग़दाद वाले केहवाले किस के अपनी ज़ात है ! बग़दाद वाले केहमारा साथ किस के साथ है ! बग़दाद वाले केहमारी लाज किस के हाथ है ! बग़दाद वाले केमुसीबत टाल देना काम किस का ! ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

शह-ए-जीलान ! दे कर ये ख़ुशख़बरी ग़ुलामों कोब-रोज़-ए-हश्र भी राहत 'अता कर दी ग़ुलामों कोरहेगी क्यूँ भला अब कोई बेचैनी ग़ुलामों को'मुरीदी ला-तख़फ़' कह कर तसल्ली दी ग़ुलामों कोक़यामत तक रहे बे-ख़ौफ बंदा ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

मोहब्बत से नवाज़ा जाएगा उन के ग़ुलामों कोये कह दो, क़ादरी था क़ादरी हूँ क़ादरियों कोबुलाया जाएगा इक सिम्त सारे ख़ुश-नसीबों कोनिदा देगा मुनादी हश्र में यूँ क़ादरियों कोकहाँ हैं क़ादरी ? कर लें नज़ारा ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

सुलूक अच्छा रखो मुझ ग़ौस-ए-आ'ज़म के दीवाने सेकिनारा-कश रहा हूँ मुद्दतों सारे ज़माने सेमुझे अब हश्र में तुम क़ादरी इन'आम पाने सेफ़रिश्तो ! रोकते क्यूँ हो मुझे जन्नत में जाने सेये देखो हाथ में दामन है किस का ! ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

तमामी देख लो इक बार जब मेरे जनाज़े कोऐ प्यारो ! कर चुको सब प्यार जब मेरे जनाज़े कोबना लो ख़ूब ख़ुश्बूदार जब मेरे जनाज़े को'अज़ीज़ो ! कर चुको तय्यार जब मेरे जनाज़े कोतो लिख देना कफ़न पर नाम-ए-वाला ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

अनोखा है, निराला है मेरे ग़ौस-उल-वरा का दरचला इस दर रईस अशरफ़ की निस्बत जामी भी ले करफ़िदाई है जहाँ जिस का, ग़ुलामी जिस की है बेहतरजमील-ए-क़ादरी ! सौ जाँ से हो क़ुर्बान मुर्शिद परबनाया जिस ने हम जैसों को बंदा ग़ौस-ए-आ'ज़म का

शैअल-लिल्लाह, या 'अब्द-अल-क़ादिर !साकिन अल-बग़दाद या शैख़ अल-जीलानी !

कलाम:मौलाना जमील-उर-रहमान क़ादरी

तज़मीन:सय्यिद जामी अशरफ़

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