नात लिरिक्स

Al Madad Khwaja-e-Deen (All Versions)

अल मदद ख़्वाजा-ए-दीं

नात ख़्वान: साबिर रज़ा अज़हरीशायर: मुहम्मद अय्यूब रज़ा अम्जदीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

इक दश्त को ख़्वाजा ने गुलज़ार बनाया हैइक वादी-ए-ज़ुल्मत को ज़ौ-बार बनाया हैअल्लाह ने ख़्वाजा को मुख़्तार बनाया हैकुल हिन्द के वलियों का सरदार बनाया है

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

अब क़ल्ब-ओ-नज़र सब कुछ जागीर तुम्हारी हैहर दिल की सतह पर अब तस्वीर तुम्हारी हैहो कुफ़्र की गर्दन ख़म क्यूँ-कर न तेरे आगेकिरदार-ए-मु'अज़्ज़म जब शमशीर तुम्हारी है

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

गुल बन के महक उठा, जो तुझ से जुड़ा, ख़्वाजा !वो ग़र्क़ हुवा समझो, जो तुझ से फिरा, ख़्वाजा !क्यूँ-कर न हों गिरवीदा हम तेरी बुज़ुर्गी परनाज़ाँ है तेरे ऊपर जब पीर तेरा, ख़्वाजा !

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

कश्मीर से तामिल तक उस का ही 'इलाक़ा हैभारत का हर इक ज़र्रा उस का ही असासा हैकुर्शी पे कोई बैठे, क्या इस से ग़रज़ हम कोता-हश्र मेरा ख़्वाजा इस हिन्द का राजा है

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

रहमत की फ़ज़ाओं में बा-ख़ैर चले जाओदुनिया की महाफ़िल से रुख़ फेर चले जाओमिलना है अगर तुम को भारत के शहंशाह सेलो इज़्न बरेली से अजमेर चले जाओ

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

लाखों को मेरे ख़्वाजा ने कलमा पढ़ाया हैभारत के मुक़द्दर को ख़्वाजा ने जगाया हैकश्कोल में ख़्वाजा ने दरिया को समाया हैअल्लाह की क़ुदरत का क्या जल्वा दिखाया है

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

ज़ुल्मत की नफ़स को फिर, या रब ! तू धुवाँ कर देअजमेर के गुलशन से अब दूर ख़िज़ाँ कर देफ़ित्तीन मुजावर को या राह-ए-हिदायत देया इन को ज़माने से बे-नाम-ओ-निशाँ कर दे

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

सूरज को भी शर्मा दे ज़र्रा मेरे ख़्वाजा कादरिया को डुबो दे इक क़तरा मेरे ख़्वाजा काहै हिन्द की हर शय पर क़ब्ज़ा मेरे ख़्वाजा काख़ुश्की मेरे ख़्वाजा की, दरिया मेरे ख़्वाजा का

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

ख़ुर्शीद-ए-ज़मीं तुम हो, महताब-ए-गगन तुम होज़हरा के लहू, इब्न-ए-सुल्तान-ए-ज़मन तुम होअल्लाह की रहमत से बख़्शिश की किरन तुम होअजमेर की धरती पर और जल्वा-फ़िगन तुम हो

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

शब्बीर ने कर्बल में इस दीं को बचाया हैइस दीन को ख़्वाजा ने फिर हिन्द में लाया हैफ़ित्नों से रज़ा ने फिर जब दीं ये बचाया हैतब जा के कहीं हम ने इस दीन को पाया है

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

गर्दिश से परेशाँ दिल हालात का मारा हैग़म इस को सताए ये कब तुझ को गवारा हैतुग़्यानी में कश्ती है और दूर किनारा हैऐ डूबतों के वाली ! अब तेरा सहारा है

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

है गुलशन-ए-हस्ती में निकहत मेरे ख़्वाजा कीसद-शुक्र कि है दिल में उल्फ़त मेरे ख़्वाजा कीकौनैन में गर तुझ को नुसरत की तमन्ना हैअय्यूब शिकस्ता ! कर मिदहत मेरे ख़्वाजा की

अल-मदद, ख़्वाजा-ए-दीं !हिन्द के माह-ए-मुबीं !

अय्यूब न भूलेगा, ख़्वाजा ! तेरे एहसाँ कोसैराब किया तू ने उम्मत के गुलिस्ताँ कोपश्ती से बुलंदी दे फिर क़ौम-ए-मुसलमाँ कोतस्कीन-ए-अतम दे दे हर क़ल्ब-ए-परेशाँ को

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।