उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zulmat-e-gham se na shab ki tirgi se KHauf kha

ज़ुल्मत-ए-ग़म से न शब की तीरगी से ख़ौफ़ खा

ظلمت غم سے نہ شب کی تیرگی سے خوف کھا

शायर: Zafar Moradabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ुल्मत-ए-ग़म से न शब की तीरगी से ख़ौफ़ खा
दोस्त बन कर जो डसे उस रौशनी से ख़ौफ़ खा

हुर्मत-ए-अस्लाफ़ है इस बंद मुट्ठी की असास
अपनी रुस्वाई से डर दस्त-ए-तही से ख़ौफ़ खा

आज-कल दो धार की तलवार हैं अल्फ़ाज़ भी
जादुई लहजे की हमला-आवरी से ख़ौफ़ खा

साज़िशों ने रुख़ पे डाले हैं बहुत दिलकश नक़ाब
वक़्त की मा'सूम सूरत सादगी से ख़ौफ़ खा

तू मिरी बर्बादियों पर किस लिए है मुतमइन
मुश्त'इल कब हो मिरी दीवानगी से ख़ौफ़ खा

बुग़्ज़-फ़ितरत आँख में तेरा खटकता है वुजूद
मस्लहत-आमेज़ कीना-पर्वरी से ख़ौफ़ खा

तुझ को तेरी गुमरही दुनिया से ओझल कर न दे
बिखरी बिखरी अब तो अपनी बे-हिसी से ख़ौफ़ खा

तेरे लहजे में सिमट आई है कड़वाहट बहुत
ज़हर जो बन जाए ऐसी शा'इरी से ख़ौफ़ खा

तंग-दिल कोई अगर फ़य्याज़ हो जाए तो डर
ऐ 'ज़फ़र' कम-ज़र्फ़ की दरिया-दिली से ख़ौफ़ खा