उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil-e-hazin pe chaman ki faza ne tanz kiya

दिल-ए-हज़ीं पे चमन की फ़ज़ा ने तंज़ किया

دل حزیں پہ چمن کی فضا نے طنز کیا

शायर: Zafar Moradabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल-ए-हज़ीं पे चमन की फ़ज़ा ने तंज़ किया
मज़ाक़ उड़ाया गुलों ने सबा ने तंज़ किया

पड़ा जो वक़्त किया शर्मसार सज्दों ने
उठाए हाथ तो मुझ पर दु'आ ने तंज़ किया

शिकस्त-ए-ज़ीस्त पे थी हौसलों की ख़ंदा-ज़नी
गुमान-ए-हस्ती हुआ तो क़ज़ा ने तंज़ किया

लिबास होते हुए भी छुपी न 'उर्यानी
खिला जो फूल तो चाक-ए-क़बा ने तंज़ किया

नहीं ये ज़ुल्म मिले सब से ज़ख्म-ए-रुस्वाई
सितम तो ये है कि दर्द-आश्ना ने तंज़ किया

'अजब ग़ुरूर-पसंदी है उस की फ़ितरत में
जहाँ चराग़ जलाया हवा ने तंज़ किया

थे ज़र्रे ज़र्रे में रौशन हज़ार आईने
हर आइने पे तिरे नक़्श-ए-पा ने तंज़ किया

ये सानिहा भी क़यामत से कम नहीं है 'ज़फ़र'
कि मुझ पे मेरी शिकस्त-ए-अना ने तंज़ किया